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Wednesday, 30 July 2025

माता कैकेयी और राम का अद्भुत प्रेम

 माता कैकेयी और राम का अद्भुत प्रेम 

माता कैकेयी और राम के विषय में अधिकतर हमने जो जाना और सुना है पूरा सत्य नहीं है।राम का माता कैकेयी और कैकेयी का पुत्र राम के प्रति प्रेम अद्भुत था।कैकेयी का जो रूप हमने देखा और सुना है वो बाह्य है।

उन्होंने राम को वनवास दिया उसका पूरा सच ये है कि राजा बनने से एक दिन पहले राम घूमते हुए माता कैकेयी के पास पहुँचे और बोले-माँ कल मुझे पिता जी राजा बनाएँगे।माता कैकेयी बोली-हाँ मुझे मालूम है और मैं भी चाहती हूँ कि तुम राजा बनो पर मैं चाहती हूँ कि तुम्हारे नाम के साथ राज्य शब्द जुड़ जाए।तुम्हारा राज्य ' रामराज्य ' कहलाये सर्वोत्तम राज्य "रामराज्य" कहा जाए।

राम ने कहा-माता इसके लिए मुझे क्या करना होगा।कैकेयी ने कहा-बेटा,इसके लिए तुम नंगे पाँव भारत में घूमो,प्रजाके दुःख को जानो,उसके दुःख और पीड़ा दूर करने के उपाय जानो।अगर सीधे राजा बनोगे तो असहाय का दर्द,दीनों का दुःख नहीं जान पाओगे,उनकी पीड़ा को नहीं समझ पाओगे।प्राथमिकता प्रजा के दुःख दूर करने की होनी चाहिए।इसलिए तुम पहले"वन जाओ"और फिर राजा "बन जाओ"। 

राम ने पूछा-कि इसके लिए मैं क्या कर्रूँ, माँ ने कहा बेटा,तुम्हें चौदह वर्ष वन में बिताने होंगे,वहाँ रहकर तुम्हें प्रजा के दुःख  को समझना होगा।राम ने कहा-माँ पिताजी नहीं मानेंगे।कैकेयी ने कहा-ये काम तुम मुझ पर छोड़ो।इसके लिए मैं सबकी गाली खाऊँगी,सबकी बुरी बनूँगी,मैं अपमान का विष पीऊँगी,बस तुम अपने मन में मेरे लिए कोई दुर्भाव मत लाना।राम ने कहा-माँ ये तो बहुत छोटी से चीज़ है।आप जानती हैं कि आपके कहने पर तो मैं कुछ भी करने को तैयार हूँ।अब मैं आपकी आज्ञा का पालन करने के लिए शीघ्र ही वन जाने तैयारी करता हूँ।

इस प्रकार कैकेयी और मंथरा के षड्यंत्र ने दशरथजी को राम को वन जाने के लिए बाध्य किया।यानि कैकेयी और राम की मिली भगत से राम का वन-वास हुआ।तभी तो राम ने माता कैकेयी से कहा था,माँ अगर आप मुझे चौदह वर्ष का वनवास न देतीं तो मैं  दुनिया के प्रति अपने कर्तव्य को नहीं जान पाता।और पूर्ण रामराज्य की स्थापना भी नहीं हो पाती।  

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Sunday, 27 July 2025

राम के द्वारा माता सीता का त्याग

                                                                    

                     राम के द्वारा सीता का त्याग 

 एक धोबी के कहने से भगवान् राम ने सीता माँ का त्याग किया। ये कथन भ्रामक है। तथ्य ये है कि जब माता सीता गर्भवती थीं तब उन्होंने भगवान् से कहा-प्रभु,अगर आपकी आज्ञा हो तो मैं कुछ दिन साधू संतों के मध्य रह कर उनके संत वचन सुनने का लाभ प्राप्त करूँ।भगवान् बोले-अति सुन्दर !होजायेगी इसकी व्यवस्था।  

 इस विषय में विचार कर ही रहे थे कि तभी धोबी का प्रसंग सुनाई दिया। धोबी के इस वृतांत ने भगवान् का काम आसान कर दिया।और तब भगवान् ने लक्ष्मण जी को आदेश दिया,कहा-लक्ष्मण,सीता को वन में जहां वाल्मीकि जी का आश्रम है वहाँ आदरपूर्वक छोड़ कर आओ ये वहां रह कर कुछ दिन संतों के साधु वचन सुनना चाहती हैं।

इस सन्दर्भ में ये प्रसंग भी जानना ज़रूरी है जो प्रायः सुनने में नहीं आता - कि राजा दशरथ की मृत्यु अकाल मृत्यु थी।उनकी शेष आयु राम को पूरी करनी थी।यही उपयुक्त समय था,जब राम अपने पिता की आयु जीते,ऐसे समय जब राम राजा दशरथ की आयु जीते तो माता सीता का राम के साथ रहना असंगत,अमर्यादित होता क्योंकि राम सीता माँ के ससुर की आयु जी रहे थे।

इस प्रकार सीता के मन की इच्छा पूरी करना,धोबी की शिकायत को लेकर समाज के सामने आदर्श प्रस्तुत करना,और पिता की आयु पूरी करना, इन तीन उद्देश्यों पूर्ति हेतु राम ने उपयुक्त समय सोच कर माता सीता का वन में प्रस्थान कराया।

इसीलिए राम ने लक्ष्मण से कहा था कि सीता को विश्वामित्र के आश्रम में छोड़ कर आओ जिससे वो संतों के साथ रहकर गर्भावस्था में उनके साधू वचन सुन कर आदर्शमय जीवन व्यतीत कर समय का सही प्रयोग करें।    


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एक         

Wednesday, 23 July 2025

नारद मोह भंग

 नारद मोह भंग 

एक बार नारद मुनि को हिमालय पर घूँमते हुए एक गुफा दिखाई दी,उसे देख वो वहीं तपस्या करने बैठ गए,अखण्ड समाधि लगाली।उनकी तपस्या देख इंद्र डर गए उन्हें लगा कि नारदजी मेरे पद को लेने के लिए ही तपस्या कर रहे होंगे। इसलिए उन्होंने नारद जी की तपस्या भंग करने के लिए कामदेव को भेजा। कामदेव अपने पूरे परिकर के साथ पहुँच गए नारद जी की तपस्या भंग करने।अनेक प्रकार के प्रयत्न किये,पूरा ताण्डव किया लेकिन नारद जी की तपस्या पर कोई असर नहीं हुआ तो कामदेव घबरा कर बोले-ऋषिवर,मुझे माँफ करें मुझसे गलती होगयी,मैं हार गया ये कहकर नारद जी के चरणों में समर्पण कर दिया।नारद जी हँसे, बोले-जाओ कामदेव,मैंने तुम्हें माँफ किया। 

पर नारद जी के मन में  घमंड आगया,सोचा कि मुझ पर काम का भी प्रभाव नहीं पड़ा और उस पर क्रोध भी नहीं आया और पहुंचे शिव जी के पास सोचा उन्हें बताएँगे कि आप ने काम को जीत लिया आप कामारि हैं लेकिन मैने तो काम और क्रोध दोनों को जीत लिया।राम भक्त शिव जी ने नारद जी को आते हुए देखा तो सोचा कि नारद जी आगये हैं,वो राम कथा कहेंगे,राम चरित्र सुनाएंगे तो समय सानंद व्यतीत होगा।लेकिन हुआ सब उल्टा,उन्होंने तो राम चरित्र नहीं काम-चरित्र सुनाया दिया।शिव जी समझ गए,बोले-मुनिदेव यहॉं तो आपने ये चर्चा कहदी पर और कहीं मत सुनाना,कोई पूछे तो भी नहीं कहना।भगवान् हरि के सामने तो बिलकुल नहीं।

पर नारद जी कहाँ रुकने वाले थे सीधे पहुँचे भगवान् के पास भगवान तो लीला कर रहे थे।जान गए कि नारद को अभिमान होगया है  इसे ठीक करना पड़ेगा क्योंकि  भगवान् अपने भक्त में घमण्ड नहीं देख सकते जैसे ही नारद जी भगवान् के पास पहुँचे उन्होंने अपनी माया का जाल फैला दिया और वे तुरंत उनके स्वागत में खड़े होकर बोले-आइये मुनिवर; आइये और अपने पास ही सिंहासन पर बिठाया,बोले आपने बड़ी कृपा की जो दर्शन दिए।इतना सुनते ही नारद जी तो फूल गए। सोचने लगे,अब तो मेरी भी कृपा का महत्व होगया। भगवान् भी मेरी कृपा के इच्छुक होगये।भगवान् ने पूछा, कहो मुनिवर कैसे आना हुआ।

 नारद जी समझ गए कि अब तो मेरा भी स्थान बड़ा होगया और सारा काम-चरित्र सुना दिया। यद्यपि शिवजी ने मना किया था तथापि नारद जी तो अभिमान में चूर थे।भगवान् मुस्कराये यही भगवान् की माया है।बोले-ऋषिवर काम आपका क्या बिगाड़ सकता है। आपके तो स्मरण मात्र से सब का काम-क्रोध मिट जायेगा।  नारद जी ने सोचा-वाह !अब तो मैं भगवान् के बराबर हो गया। पहले भगवान् का नाम लेने से काम-क्रोध मिटता था,अब मेरा भी नाम लेने से काम क्रोध मिट जायेगा।  ये सोचते हुए अभिमान में चूर नारद जी चले गए।रास्ते में भगवान् ने माया नगर प्रकट कर दिया।उस नगर के राजा थे,शीलनिधि। उन्हें अपनी पुत्री विश्वमोहिनी का विवाह करना था।नारदजी से मिले तो अपनी पुत्री का हाथ दिखाया।हाथ देख कर नारद जी ने कहा इसका पति विश्व विजयी होगा,समादरणीय सारे ब्रह्माण्ड का स्वामी होगा और ये कहते-कहते नारदजी के हृदय में काम का प्रवेश होगया।सोचने लगे इस कन्या से तो मेरा ही विवाह होजाय तो अच्छा लेकिन मेरे इस रूप को देख तो कन्या मुझे अपना पति नहीं चुनेगी।और उन्होंने भगवान् का स्मरण किया और  भगवान् प्रकट होगये,नारदजी  बोले-प्रभु आप अपना रूप मुझे दे दो जिससे वो कन्या मेरा वरण करले,इस के लिए जिसमें मेरा हित हो वही करना।भगवान् ने कहा-बिल्कुल वही करूँगा, जिस में आपका हित होगा।  

और भगवान ने सुन्दर बनाने के बजाय उनका चेहरा बन्दर जैसा बना दिया।नारद जी चले गए स्वयंवर में।स्वयंवर शुरू हुआ तो नारद जी बार-बार उचक-उचक कर देख रहे थे उन्हें तो विश्वास था कि कन्या उनके ही गले में वरमाला डालेगी। उन्हें तो लग रहा था कि उनसे अधिक खूबसूरत और कौन होगा। लेकिन इसी बीच ऐसा हुआ कि उनकी आशा के विपरीत भगवान् राजकुमार के वेश में आये और विश्वमोहिनी के गले में वरमाला डाल कर लेगये। उधर शंकर जी के गण घूंम रहे थे,वो नारद जी की हालत देख रहे थे।जाकर हँसते हुए बोले-नारद जी,जाकर अपना चेहरा तो देखिये,आपका चेहरा देख कर कौन कन्या चुनेगी आपको अपना पति । नारद जी ने  जाकर पानी में अपना बन्दर का  चेहरा देखा तो आग बबूला होगये। 

तमतमाते हुए भगवान जी के पास जा रहे थे कि आज तो मैं भगवान् को श्राप दूँगा,कहूँगा कि मैने आपसे सुन्दर रूप माँगा और मुझे आपने बंदर बना दिया,मेरा इतना अपमान किया, मेरा उपहास कराया कि तभी रास्ते में उन्हें लक्ष्मी जी और राजकुमारी जी के साथ भगवान् मिल गये।देखते ही नारदजी तो बरस पड़े बोले-आप तो परम स्वतंत्र हैं।मैंने अपने एक विवाह के लिए आपसे सुन्दर रूप माँगा था और आपने मुझे बन्दर का चेहरा दे दिया।आप दो-दो के साथ घूँम रहे हैं।आज मैं आपको श्राप देता हूँ जाओ आपको भी नारी विरह सताएगा।भविष्य में बन्दर ही आपकी सहायता करेंगे।इतना कह कर जब नारदजी चुप होगये तो भगवान् ने अपनी माया हटा दी।

अब न वहाँ लक्ष्मीजी थीं न राजकुमारी।भगवान् ने उनका श्राप स्वीकार किया और मुस्करा कर बोले-नारद अब आप मुझे परम स्वतंत्र नहीं कह सकते।आपका श्राप मैंने शिरोधार्य किया।नारदजी समझ गए उनको लगा,ये तो बड़ा अपराध होगया और भगवान् के चरणों में गिर पड़े और बोले-भगवन-मुझे माँफ करें,मेरी वाणी झूठी हो जाय,मेरा श्राप झूठा हो जाय। भगवान् मुस्कराये और बोले-उठो नारद तुम्हारे अंदर काम-क्रोध देख कर ये सब मैंने ही किया।मैं अपने भक्त में कोई दोष नहीं देख सकता।नारद जी  बोले-पर मुझे शांति कैसे मिलेगी। भगवान् बोले जाओ,भगवान् शंकर के सतनाम का जप करो।  

और इस प्रकार नारद जी का मोह भंग हुआ और नारद जी पुनः तपस्या के लिए चले गए। 

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Friday, 18 July 2025

रामचरित मानस के रोचक प्रसंग

 राम चरित मानस के रोचक प्रसंग 

दक्ष प्रजापति का यज्ञ :शिव को श्राप 

एक बार ब्रह्मा के पुत्र दक्ष ने यज्ञ करवाया जिस में सभी ऋषि-मुनियों को आमंत्रित किया गया । सबके आने के बाद अध्यक्ष दक्ष प्रजा पति का आगमन हुआ,सभी रिषि मुनि उनके सम्मान में खड़े हुए किन्तु ब्रह्मा जी और शिवजी नहीं खड़े हुए। ब्रह्मा जी तो दक्ष के पिता थे और शिव जी अपने इष्ट के ध्यान में तल्लीन थे इसलिए उन्हें उनके आने का आभास ही नहीं हुआ। राजा दक्ष जो सभी प्रजा पतियों के अध्यक्ष थे उन्हें घमंड था इस बात का।

 इस पर उन्हें शिव जी पर इतना क्रोध आया कि शिवजी को उन्होंने धृष्ट कहा,नीच कहा और कहा कि इसे यज्ञ की आहुति का भाग नहीं मिलेगा। इसने मेरा अपमान किया है मेरा उपकार भी नहीं माना कि मैंने इस बन्दर जैसी आँखों वाले के साथ अपनी मृगाक्षी जैसी आँखों वाली बेटी का विवाह किया। जो हड्डियों की माला पहनता है,चिता की भस्म लगता है।कौन देता इसे अपनी कन्या !

 इतना सुनने पर भी शिवजी तो शांत रहे लेकिन शिव जी के गणों को बहुत गुस्सा आया उन्होंने दक्ष को कहा- नीच तुम्हारा तत्व ज्ञान नष्ट हो जाय, तुम मूढ़ होजाओ। इस पर दक्ष के सेवकों ने श्राप दिया कि तुम भक्षाभक्ष खाने वाले हो जाओ।तब के शिवजी गण बोले-तुम पतित होजाओ,मार्ग-भ्र्ष्ट हो जाओ। इस प्रकार दोनों तरफ से एक दूसरे पर श्राप के बाण  चलते रहे। तब शिवजी ने इस उत्पात को समाप्त करने लिए सोचा कि अब चलना चाहिए। और वे उसी समय गणों के साथ  यज्ञ शाला से चले गए।और यज्ञ का कार्य वहीँ समाप्त होगया।    

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Tuesday, 15 July 2025

सटी का शरीर त्याग !शिव का क्रोध

 सती का शरीर त्याग :शिव का क्रोध 

शिव जी गणों के श्राप से आहत दक्ष ने बदला लेने के उद्देश्य से बाजपेयी यज्ञ का आयोजन किया जिसमें विष्णु,शिव और ब्रह्माजी को छोड़ कर सभी देवता,ऋषि मुनियों को आमंत्रित किया। सभी अपने-अपने विमानों से कैलाश पर्वत के ऊपर से गाते-बजाते जारहे थे।

 उधर शिवजी सती जी को भगवान् की कथा सुना रहे थे। सती जी का ध्यान भंग हुआ तो शिवजी से पूछा - प्रभु ये विमान कहाँ जारहे हैं ? शिव जी ने कहा देवी कथा सुनो इधर उधर मत देखो। लेकिन सती बार बार हठ करने लगीं तब शिव जी ने कहा आपके पिता यज्ञ करा रहे हैं वे सब वहीं जारहे हैं। सती ने कहा कि तब तो हमें भी वहां जाना चाहिए। शिवजी ने कहा विना  निमंत्रण के हमें नहीं जाना चाहिये चाहे वो कोई अपना ही हो। सती बोली पिता के घर जाने में तो कोई बुराई नहीं। शिव जी ने कहा-पर अगर कोई विरोध मानता हो तो वहां नहीं जाना चाहिए,कल्याण नहीं होगा। इतना सुनने पर भी सती का मन नहीं मान रहा था और वो इधर-उधर घूमने लगीं।

 शिवजी जान गए कि इनका मन यहाँ नहीं है,बोले-अगर तुम्हारा  इतना ही मन है तो जाओ पर मेरी अवहेलना करके जाओगी तो अमंगल होगा,तुम्हारी मृत्यु भी हो सकती है। ये कहकर सती को अपने गणों के साथ यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए भेज दिया।घर जाकर सती जी ने देखा कि किसी ने उनका सम्मान नहीं किया । केवल माता ही प्रेम से मिली।ये देख कर सती ने पिता से कहा, पिताजी आपने सबको निमंत्रण दिया मेरे स्वामी को भी बुलाते तो अच्छा होता। सती को देख प्रजापति दक्ष को क्रोध आया बोले-उस अघोरी पाखंडी को,जो चिता  की भस्म लगाता है। उसके आने से तो मेरा यज्ञ अपवित्र होजाता और तुम्हें किसने बुलाया।

 ये सुन सती का क्रोध फूटा-डाँटते हुए पति को याद करते हुए पिता को अपमानित करते हुए बोली - अरे मूढ़,मंदमति तू मेरे स्वामी की निंदा करता है।  ऐसे शिवद्रोही की तो मैं पुत्री नहीं कहलाना चाहती और उसी समय अपने योगबल से दिव्याग्नि प्रकट की और उसीमें अपना शरीर दग्ध दिया। मरते समय भगवान् को स्मरण किया और कहा कि जन्म-जन्म शिव के चरणों में मेरा अनुराग बना रहे।इसके बाद सती जी ने पर्वत राज हिमालय के यहां जन्म लिया और पार्वती कह लाईं।

ये सारा वृतांत नारद जी ने जाकर शिवजी को बताया। सुनकर उन्होंने वीरभद्र को आज्ञा दी की जाओ और जाकर दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करो। वीरभद्र ने अपने सभी सैनिकों साथ जाकर सभी देवताओं को मार पीट कर घायल कर दिया। दक्ष को पकड़ कर यज्ञाग्नि में डाल कर उनकी गर्दन को तोड़ दिया और उसके स्थान पर बलि के लिए लाये गए पशु का सर लगा दिया।  और यज्ञ मंडप में आग लगा कर वापस चले गए। 

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Tuesday, 29 April 2025

वो लाल बिंदिया

 वो लाल बिंदिया 


ज़रा देखो तो !
झुर्री पड़े माथे पर वो बड़ी लाल बिंदिया !
गड्ढे पड़े गालों पर आयी लालिमा !
चांदी से चमकते, झिलमिलाते बालों में लाल सिन्दूर !
सिकुड़े हुए ओठों पर लगी लाली,
!और लजीले ओठों पर लुभाती मंद-मंद मुस्कान !
कितनों का जी न चुरा लेती होगी!
चोरी-चोरी देखने को आतुर कितने जवान दिल !
और उस पर खूबी ये,
कि अपनी इस खूबी से ये मोहतरमा बेखबर नहीं हैं!
 (अज्ञात यौवना की तरह ) 
उन्हें सब पता है कि वो कहाँ-कहाँ,किस-किस पर बिजली गिरा रही हैं।
सारी धन-दौलत तो इस बिंदिया में ही बसी है !
हाय रे !
भारतीय संस्कारों का प्रदर्शन करती कितनों पर जुल्म ढाती बुढ़ापे की
 " ये लाल बिंदिया !"
अजर-अमर रहे ऐसी ये लाल बिंदिया।

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Wednesday, 9 April 2025

वो लाल बिंदिया

 वो लाल बिंदिया 

ज़रा देखो तो !

झुर्री पड़े माथे पर गजब ढाती वो लाल बिंदिया !

गड्ढे पड़े गालों पर छायी लालिमा !

चाँदी से चमकते बालों में लाल सिन्दूर 

सिकुड़े हुए ओठों पर लगी लाली और 

उस पर लुभाती मंद-मंद मुस्कान 

कितनों का जी न चुरा लेगी !

चोरी-चोरी देखने को आतुर हैं 

कितने जवां दिल !"

और और 

उस पर खूबी ये कि 

मोहतरमा अपनी इस खूबी से बेखबर नहीं। 

      (अज्ञात यौवना की तरह )

उसे सब ज्ञात है कि  

वे कहाँ-कहाँ किस-किस पर बिजली गिरा रहीं हैं। 

दुनिया का सारा खजाना तो इस बिंदिया में ही बसा है।

हाय रे !कितनों पर ज़ुल्म ढाती है 

भारतीय संस्कारों का प्रदर्शन करती ,

बुढ़ापे की ये "लाल बिंदिया !!"

"अजर-अमर रहे  ऐसी ये "लाल बिंदिया!" 

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Sunday, 16 February 2025

idpl से दिल्ली रावानगी

आई डीपी एल से (१९७७) में दिल्ली रवानगी 

१९७३ में विवाहोपरांत मैं वीरभद्र ही आयी थी, कम्पनी में उन दिनों लॉक आउट का खतरा बना रहता था तो कहीं और नौकरी की तलाश करते रहते थे।लगभग तीन वर्ष रहे हम। इस बीच हम एक बेटा और एक बेटी के माता-पिता बन चुके थे।  बेटा लगभग ३ वर्ष का और बेटी २महीने की थी।  तभी एच पी सी दिल्ली से इन्हें नियुक्ति पत्र मिला साक्षात्कार हो चुका था प्रतीक्षा थी कहीं से नियुक्ति पत्र की।वह भी आगया। 

चूँकि इनके माता-पिता दिल्ली में ही थे,इनकी पढ़ाई-लिखाई दिल्ली में ही हुई थी इसलिए इनका मन भी दिल्ली में ही था। उस समय मैं सरकारी स्कूल में अध्यापिका थी किन्तु बेटी को रखने की कोई उचित व्यवस्था नहीं थी। कोई क्रेच नहीं था इसलिए मेरी नौकरी भी नहीं संभव नहीं थी। बहुत सोच विचार के बाद वीरभद्र छोड़ने का निश्चय किया। इनका अपना घर शाहदरा दिल्ली में था। इनकी अपनी माँ पहले ही जब ये चार वर्ष के थे गुजर चुकी थीं। अब तक पिता भी नहीं रहे थे।अब सौतेली माँ के पास रहने के लिए पत्र लिख कर बताया अपने जॉब के बारे में और बताया कि हमें घर में रहना होगा, घर में एक कमरा है पीछे उसमें रह लेंगे पर शाहदरा घर से कोई जबाव नहीं आया इसलिए इन्होंने कम्पनी से त्यागपत्र दे दिया कम्पनी ने भी स्वीकार कर लिया। 

लेकिन जैसे ही स्तीफे की स्वीकृति मिली कि घर से पत्र मिला कि घर में जगह नहीं है कमरे में किरायेदार रहता है यानि अब अपना प्रबंध कहीं और करना है किन्तु कुछ समय तो घर में ही रहना होगा, कुछ सामान भी घर भेजा जा चुका था। वीरभद्र छोड़ कर हम घर पहुँच गए। सब कुछ माँ को बताया। इन्हें ऑफिस भी ज्वाइन करना था। 

इस तरह १८-१९ दिन हम रहे लेकिन माँ का हठ यही था कि अपना इंतजाम करो और एक दिन उन्होंने हमारा सामान भी आँगन में फेंक दिया, बेटे को भी हाथ पकड़ कर बाहर आँगन में बिठा  दिया कि "चल बेटा तू भी चल" अब रहना अधिक मुश्किल होगया। शाम को जब ये  घर आये तब इन्हें ज्ञात हुआ। पर अब क्या करते घर से तो हम चारों बाहर  आगये। यानि घर छोड़ दिया।  लेकिन चलते चलते सोच रहे थे कि जाएँ कहाँ, बोले कुछ दिन तुम माँ के पास चली जाओ लेकिन ये मेरे लिए और मुश्किल लगा। तो बोले अच्छा अभी वीरभद्र ही चलते हैं। क्वॉटर तो ३ महीने हमारे पास ही है चाभी भी हमारे पास है ये विचार कर हम वीरभद्र ही पहुँच गए। 

वहाँ रह कर अपने मित्रों बात चीत की थोड़ी हिम्मत आयी और घर शाहदरा आगये तब तक माँ ने विहार कॉलोनी में किसी के साथ जॉइंट रहने के लिए एक कमरा किराये पर देख रखा था। इसके बाद कुछ ज़रूरी सामान के साथ हम वहीं आगये। दो कमरे थे उसमें एक में मकान मालिक अपने दो बच्चों के साथ रह रहे थे। एक हमें दे दिया था। क्वाटर में एक बाथ रूम,एक टॉयलेट कम्बाइंड था। किचिन उन्हीं के पास थी। 

हमारे कमरे में एक बड़ी अलवारी थी उसमें हमने अपने भगवान् जी को स्थापित किया। बाकी में अपना सामान रखा। पर अभी हमारा सामान जैसे एक बड़ा बॉक्स, एक स्टील एलमिरा, बैड और ड्रेसिंग वॉल मिरर वहीं थे। एक कमरे में लाना मुश्किल लग रहा था, पर माँ ने कहा- अपना सामान यहाँ से ले जाओ नहीं तो किसी को बेच देंगी। सामान की ज़रुरत भी थी इसलिए बहुत कहने पर ये वहाँ से बॉक्स और अलवारी ले आये बाकी वहीं छोड़ दिया। 

इस बॉक्स और अलवारी के आने से बहुत सुविधा होगयी। एक टेबल एच पी सी के ऑक्शन से खरीद कर लाये तो गैस बर्नर रखने का आराम होगया। एक लकड़ी का तख़त था और एक फोल्डिंग बैड खरीद लिया तो फेमिली का काम नियमित रूप से चलने लगा।  इस तरह तरह २ वर्ष हम उसी क्वाटर के एक रूम में रहे। वहीँ बेटे का सरस्वती शिशु मंदिर में एडमीशन के जी में करा दिया। 

दोवर्ष के बाद इनके ऑफिस के एक वर्कर ने कहा कि उसका एक वन रूम सेट साकेत में रेंट के लिए खाली है आप चाहें तो ले सकते हैं। इस तरह हमने वहां शिफ्ट कर लिया था।  4-c साकेत तीन वर्ष हम उसमें रहे वहाँ अच्छा लगा। ३वर्ष वहाँ रहे किन्तु अब उसे भी खाली करना था क्योंकि जिसका मकान था सेवा राम, उसको खुद ही वहाँ  रहना था तो फिर दौड़-भाग हुई और भगवान की असीम कृपा से उसी घर के ठीक सामने वाला क्वाटर ४डी मिल गया यानि कि सामान भी उस घर से केवल खिसका के  ही ले गए कोई परेशानी नहीं हुई किन्तु उसे भी २ वर्ष बाद खाली करना पड़ा क्योंकि उसमें भी मकान मालिक को आना था। 

पर यहाँ एक और भी बड़ा चमत्कार हुआ हम मकान तो देख ही रहे थे,२ मकान हमारी पसंद में थे उनमें से एक मकान का मालिक हमसे एडवांस भी ले गया था। २-१ दिन में शिफ्ट करना था क़ि शाम को वो एडवांस का चैक वापस करने आया और बोला सॉरी मुझे खुद ही अपने किसी अर्जेन्ट काम के लिये घर चाहिए, ये तो ऑफिस में थे मुझे ही बात करनी पड़ी बहस की मैंने लेकिन दिमाग में दूसरा मकान भी था तो बहस छोड़ उसका चैक लिया और उसे विदा कर शीघ्र ही मालवीय नगर वाले मकान पर दोनों बच्चों को  लेकर पहुंची।

 अँधेरा होरहा था, जाकर मकान मालिक से चाभी मांगी वे बोले आपसे कहा था न कि चाभी ये लटक रही है आप जब चाहे ले जाना और मैं चाभी लेकर भगवान् को धन्यवाद देती हुयी बस पकड़ कर घर आगयी। शाम को ऑफिस से जब ये घर आये तो बोले कल सन्डे है शिफ्ट कर लेते हैं मैंने कहा वो तो चैक वापस देगया कह रहा था उसे खुद ही रहना है वो भी हैरान होगये कि अब - -----थोड़ी देर परेशान कर मैं हँसी और सारा मामला बताकर चाभी उन्हें पकडा दी तब चेंज कर चाय-वाय पीकर फ्रेश हुए। इस तरह वहीं साकेत में ८-बी क्वाटर मिला और हम वहाँ शिफ़्ट होगये। ३-४ साल यहाँ भी रहे,तब  बेटा सात वीं में और बेटी उस समय चौथी कक्षा में थी।

  पति हमेशा अपना मकान चाहते थे कोशिश करते रहते थे अपनी सामर्थ्य के अनुकूल मकान मिल जाय। कोशिश ये भी रहती थी कि मुझे भी कहीं जॉब मिलजाय इसलिए अक्सर जहाँ भी वेकेंसी देखते तो मुझसे ऐप्लीकेशन लिखवा कर एप्लाय करवाते रहते थे। तभी एक स्कूल की वेकेंसी जो पोस्ट बॉक्स के नम्बर से निकली थी मैंने एप्लाय किया और कुछ ही दिन में साक्षात्कार के लिए कॉल आगया तब तक मुझे ये नहीं मालूम था कि ये स्कूल इंग्लिश मीडियम है पता लगने पर मैं घबरा गयी, मैंने हिंदी मीडियम से ही पढ़ाई की थी पर कॉल आया था इन्होंने  हिम्मत दी तो चली गयी। 

इंटरव्यू दिया काफी टफ था। बोर्ड में भी काफी लोग थे पर होगया और घर आगये कुछ दिन बाद सैलरी डिस्कस करने के लिए फिर कॉल आया और फिर जाना हुआ।  मेरा नंबर आने पर जब मैं गयी तो मुझसे कहा अभी हम आपको  बारह सौ ही दे पाएँगे। स्कूल नया है सारी  फॉर्मेलिटी पूरी होने पर पूरा स्केल देंगे अगर आप एग्री हों तो ये अपॉइटमेंट लेटर है इस पर सिग्नेचर कीजिये और अमुक तारीख पर नॉएडा स्कूल ब्रांच पर आइये। मैंने कुछ सोचा मेरी पोस्ट हिंदी के लिए थी इंटरव्यू हिंदी इंग्लिश दोनों में ही हुआ था स्पीकिंग इंग्लिश नहीं थी पर थोड़ी बहुत बोलती थी इसलिए मैंने इंग्लिश में ही पूछा "शैल आइ कॉल माय हस्बैंड,ही इज़ वेटिंग आउट साइड " उन्होंने कहा श्योर प्लीज़ कॉल और तब मैने इन्हें बुलाया इनके आने पर सैलरी डिस्कस की बात इन्हें बतायी और इनके एग्री होने के बाद वहीँ सिग्नेचर कर नियुक्ति पत्र लेकर बहुत खुश होकर घर आये। 

और तब आगे का प्लान किया नॉएडा जाना था, बच्चों का स्कूल चैंज करना होगा पर पहले अमुक डेट पर नॉएडा जाना था स्कूल की नयी बिल्डिंग देखनी थी अभी केवल १२ रूम ही थे बच्चों के एडमीशन टैस्ट होने थे इसके लिए २-३ दिन हमें (कुल ९ टीचर्स)को स्कूल आना था, पेपर बनाने थे। इसके बाद बच्चों को बुलाया गया उन्हीं में से एक दिन मैंने अपने बच्चों को भी टेस्ट दिलवाया रिज़ल्ट में पास होने पर बेटे का आठ वीं में और बेटी का पांचवीं में एडमीशन होगया। मई और जून में नेहरू प्लेस से बस से आती रही और नॉएडा में मकान भी देखते रहे और तब पॉवर ऑफ़ एटॉर्नी पर २रूम सेट का एक मकान १९ सेक्टर में हमने खरीद लिया और अब जुलाई से पहले शिफ्टिंग करनी थी। 

उससे पहले एक किराये का मकान भी लिया क्योंकि अपने मकान में कुछ काम कराना था, अब बच्चों को स्कूल जाना था। तब तक हम उस मकान में रहे। दो महीने में हमारा मकान रहने लायक हो गया था। एक दिन उसका शुभारम्भ कराया। पंडित जी आये छोटा सा हवन  पूजा कराई अधिक कुछ नहीं किसी को बुलाया भी नहीं। न तो स्कूल से छुट्टी मिलनी थी और न हमारी इतनी सामर्थ्य थी, लेकिन मुझे याद है अपनी दोनों छोटी बहिनों को शायद रु १५१ /-के मनिआर्डर से भेजे थे और तब हम भगवान् की दया से अपने घर में शिफ्ट होगये। ३० अगस्त को शिफ्ट हुए। बेटे का जन्म दिन था उस दिन।  स्कूल से  टी जी टी ग्रेड का पहला  चेक मिला था बहुत अच्छा लगा था उस दिन।

 लाइफ में कुछ स्थिरता आरही थी कि तभी नॉएडा ऑथर्टी से एक मकान की एक स्कीम निकली जिसमें नॉएडा में ही काम करने वाले ही अप्लाई कर सकते थे। इनका जॉब दिल्ली में था इसलिए मेरे नाम से इन्होंने अप्लाई किया और दो साल में हमें लॉटरी से मकान भी मिल गया जो हमारे इस मकान से बड़ा था। हमारी छोटी सी फैमिली के लिए पर्याप्त था। हम सब बहुत खुश थे बच्चे बहुत खुश थे फिर इसका भी उद्घाटन कराया और सेशन ख़त्म होने पर उस घर से यहाँ शिफ्ट हुए। ये शिफ्टिंग आखिरी और संतोषमय रही। आज हम इसी घर में हैं। दोनोंबच्चों के विवाह होगये, बेटा आर्मी ऑफिसर है उसकी पोस्टिंग होती रहती है बेटी कोलकाता में है दोनों के एक- एक बच्चा है।  वे पढ़ रहे हैं  बेटी ऑन लाइन जॉब कर रही है। 

२०१३ में मेरे पति भगवान् के पास चले गए। तब से  मैं उनके अभाव के साथ कभी यहाँ कभी बच्चों के साथ समय व्यतीत कर रही हूँ। लिखने की मेरी आदत है। सामान्य से टॉपिक पर यदा-कदा कुछ लिखती रहती हूँ इसमें मेरे बेटे ने हैल्प की। मुझे कंप्यूटर पर लिखना सिखाया। मेरे लेखों की पुस्तक भी उसने  पब्लिस करवा दी है। इस तरह लिख कर और बहू बेटे के साथ जीवन यापन कर बहुत आराम से रह रही हूँ। भगवन का आशीर्वाद साथ है बस यही सहारा है। कोशिश करती हूँ, खुद भी खुश रहूँ, बच्चों को भी खुश रखूँ। घुटने की प्रॉब्लम के कारण थोड़ी असहाय सा अनुभव करती हूँ पर ये छोटे से कर्म हैं भगवान के आशीर्वाद से पूरे हो लेंगे। इसी तरह समय पर जीवन की एक दिन इतिश्री भी हो ही लेगी।  

जय श्री राम 

                                     *****

 




 





  




 




 




  



 



                 


   








   

Wednesday, 23 October 2024

जेनेरेशन गेप

 जेनेरेशन गेप 

अरे भई !

ये "जेनेरेशन गेप "इक तरफ़ा कैसे होगया ? 

दो जनों के बीच "गेप"! 

तो एक ही को प्रिवलेज क्यों ? 

क्या ही विचित्र तर्क है; कि :"जमाना बदल गया है समझो, अब ऐसा नहीं होता।'

यही तो कहा जाता है न ! 

अरे भई , किसे समझा रहे हो दूसरे पक्ष के लिए भी जमाना बदला है, उसे भी 'जेनेरशन गेप" का अधिकार मिलना है। 

उसे भी अपनी तरह से जीना है। 

सो भूल जाओ , "जेनेरेशन गेप' का लाभ उठाने की बात !

खुद भी जीओ और दूसरे को भी जीने दो , 

उसकी अपनी तरह। 

धन्यवाद !!


Wednesday, 10 July 2024

 जीवन के कुछ विशेष स्वानुभव 

2024 march  से  2024 मई 

३० मार्च कैलाश हॉस्पिटल एडमिट 

१४ अप्रेल डिस्चार्ज 

पुनः ----

२४ अप्रेल कैलाश हॉस्पिटल एडमिट 

४ मई डिस्चार्ज ( एकमहीने का कालचक्र ) 


      कुछ अभूतपूर्व घटनाएँ जो समय समय पर मेरे जीवन में घटती रही हैं। जिनका भी विवरण मैं करती रही हूँ। इसी से जुड़ी एक और घटना अभी-अभी बहुत ही ज्वलंत रूप में मेरे साथ हुई। ये घटना ३० मार्च २०२४ से शुरू हुई।

     शाम को मैंने खाना खाया उसके कुछ देर बाद ही मेरे पेट में दर्द शुरू हुआ,सोचा गैस का होगा तो अजवाइन,काला नमक गरम पानी के साथ पीया किन्तु कोई आराम नहीं,दर्द बढ़ता ही गया। बहु मेरे पास थी,बेटा अपना काम कर रहा था। मैं नहीं समझ पारही थी कि ये दर्द किस स्तर का है। लिम्का,डाइजीन सब ले लिया कोई आराम नहीं। हालत ऐसी होगयी कि अब उल्टियां भी शुरू होगयीं। शाम ७ बजे से १२.३० बज गए। तब बेटे से कहा बेटा एम्बुलेंस बुलाओ अब मैं हिल भी नहीं सकती। और तत्काल हॉस्पिटल के लिए रवाना होना पड़ा।

     उसके बाद जो मेरे साथ घटित होता रहा, चकित करने वाला था,असामान्य व हैरान करने वाला था उपचार होता रहा ये तो सामान्य जीवन का हिस्सा था। इसके साथ-साथ जो परोक्ष रूप में मेरे साथ होरहा था जिसे केवल मैं ही देख पारही थी,उसीको बताना आवश्यक है। ९९ प्रतिशत लोगों को विश्वास करना मुश्किल होगा, यही कहेंगे वहम है या सपना है। सामान्य जनजीवन के लिए बिलकुल सही है पर बार-बार अपने साथ घटित घटनाओं को सोचती हूँ तो लगता है कुछ तो है जिसे परिवार के लोगों ने स्वयं महसूस किया है। लीमाखोंग की घटना भी कुछ इसी ओर संकेत करती है। 

     पेट के दर्द का कारण डॉक्टर ने बताया,कि आँतों में ब्लॉकेज है ऑपरेशन करना होगा आपकी परमीशन चाहिए,आपस में डिसकस करने के बाद बच्चों ने मुझ से पूछा मैंने कहा प्रॉब्लम है तो करना ही होगा। इस प्रकार ऑपरेशन की प्रक्रिया शुरू हुई मुझे एनेस्थिया दे दिया  गया तब तो मैं बेहोश थी। उस समय जो मैं देख रही थी उसे सपने जैसा कहा जा सकता है। मैं देख रही थी कुछ लोग मुझे बहुत तकलीफ दे रहे हैं बहुत देर तक ऐसा होता रहा मैं लगातार ज़ोर-ज़ोर से चीख़ रही थी। और तब मैं दूर चेयर पर बैठी सब देख भी रही थी। ओप्रेशनकी तकलीफ के कारण मैं फिर चीख पड़ी। तब जाकर वो लोग रुके तब मुझे सुनाई दिया अरे ये तो जाग रही है और मुझे रूम में लाये। यानि तब शायद ओपरेशन पूरा हुआ होगा।

      लेकिन इसके बाद  मैं icu वार्ड में आयी उस वार्ड में पार्टीशन था दूसरे पेशेंट के लिए। मेरे रूम में एक मेरा बेड  था दूसरा मेरे असिस्टेंट  का मेरे बेटे के लिए। यहां से ही मेरी लाइफ का एक नया मोड़ शुरू हुआ। रात को जब मैं सोरही थी अचानक किसी फुसफुसाहट से नींद खुली,देखा तो मेरे पिलो की साइड में सफ़ेद कपड़ों में दो व्यक्ति खड़े कुछ कानाफूंसी कर रहे थे मैंने बेटे को आवाज़ देकर जगाया और कहा बेटा यहाँ दो सिस्टर खड़ी बातें कर मुझे डिस्टर्व कर रही हैं देख कर बेटा बोला ,माँ कोई नहीं हैं बराबर वाले पोरशन से आवाज़ आरही होगी। सुन कर मैं सोगयी किन्तु ये क्रिया नित्य जारी रही।हर रात वही दो व्यक्ति सफेद वस्त्रों में मेरे पिलो की साइड में खड़े होकर फुसफुसाहट करते। नित्य के इसी क्रम में मैंने नोटिस किया कि उनमें से एक व्यक्ति मुझे सफेद चादर उढ़ाता और दूसरा मेरी गर्दन पर हाथ से दबाव डालने की कोशिश करता। तो पहला वाला उसे हटाता और पुनः मुझे ठीक से चादर उढ़ा कर सुरक्षित कर मेरा बचाव करता। एक महीने लगातार ये क्रम चला उसके बाद मैं डिस्चार्ज होकर१४ अप्रेल को घर आगयी। घर आकर मुझे लगा कि अब वो लोग यहां नहीं आएंगे किन्तु नहीं वो यहाँ भी आये और उसी तरह फुसफुसाहट करने लगे लेकिन इस बार आपस में बातें कीं और उनमें से एक चला गया। उसके जाने के बाद पहला वाला मुझसे कुछ इस तरह बोला कि अब आप सुरक्षित हैं आराम कीजिये जब तक समय है। 

     और उसके बाद वो कभी नहीं आया। तब मैने विचार किया,क्या था ये सब ! सोचा शायद देवदूत और यमदूत ही होंगे उनमें से एक मुझे बचा रहा था और दूसरा मुझे लेजाना चाह रहा था। पर देवदूत ने यमदूत को मात दी। पर कब तक के लिए---। नहीं मालूम। 

     इसी बीच एक बात और हुई धर्मराज ने उन दोनों को बुलाया और पूछा - भाई राजेश नाम के व्यक्ति को क्यों नहीं लाये अभी तक ? उन्होंने जबाव दिया- भगवन,आपने राजेश नाम कहा तो हम पुरुषों में ढूँढ रहे थे पर ये महिला है अब------देखते हैं । 

पुनश्च -

एडमिट २४ अप्रैल 

      रात अचानक मुझे वाश रूम जाना था तो बेटे को बुलाया,इतनी कमज़ोरी थी कि मैं स्वयं नहीं जा पारही थी ,बेटे ने जैसे ही आकर मुझे सहारा दिया कि मैं बेहोश होगयी कुछ-कुछ होश था मैं बेटे से कह रही थी मुझे उठाकर वाश रूम में लेजाओ  तब वो लेकर मुझे गया। लेकिन वहां यूरिन के स्थान पर ब्लीडिंग देख कर घबरा गया। और तब फिर एम्बुलेंस को कॉल कर बुलाया और फिर से हॉस्पिटल में एडमिट होना पड़ा। ४मई तक ब्लीडिंग का उपचार हुआ। कारण पता लगाने के लिए कि ब्लीडिंग क्यों हुई,एंडोस्कोपी की गयी। ये बहुत ही पेनफुल थी। कारण तो नहीं पता लगा लेकिन ब्लीडिंग रुक गयी। और फिर तसल्ली होने पर मुझे ४मई को डिस्चार्ज कर दिया और मैं घर आगयी। 

 

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Tuesday, 2 July 2024

मेरे पापा और उनका परिवार

मेरे पापा और उनका परिवार 

   अपने पापा के विषय में अन्यत्र भी प्रासंगिक रूप से थोड़ा बहुत लिख चुकी  हूँ। पर आज मैं कुछ अधिक विशेष जानकारी  देने का प्रयास कर रही हूँ। मेरे दादा धौलपुर निवासी श्री राम नाथ शर्मा रईस के नाम से विख्यात थे। तब राजा-तंत्र था। वे वहां के नर्सिंग भगवान के मंदिर के पुजारी थे। मंदिर में जब भी कोई पारम्परिक उत्सव होता था तो पूरा परिवार राजसी घराने के राजस्थानी लिबास से सुसज्जित होकर उपस्थित होता था। माँ का विवाह बहुत ही शानदार तरीके से हुआ। बारात की चार दिन तक आवभगत की गयी। भर-पूर लेनदेन व शानो सज्जा के साथ सम्बन्ध स्थापित हुआ।

   हमारे पापा सबसे पहली संतान थे , उस से पहले दादाजी तक सब गोद ली हुई संतान थी। बहुत ही लाढ़-प्यार से पापा का लालन-पालन हुआ। उनकी शिक्षा बी ए ,एल एल बी तक हुई। माँ के विवाह के तीन वर्ष बाद मेरा जन्म हुआ था। मेरे बाद मेरी दो बहिनों का जन्म हुआ। तीन लड़कियों के लिए माँ को बहुत सुनना पड़ता।जब माँ पापा से कहतीं तो पापा कहते कोई कुछ भी कहे भी कहे चिंता मत करो, मैं अपनी बेटियों को पढ़ा-लिखा कर योग्य बनाउँगा उसके बाद ही  विवाह करेंगे। इस  तरह सब ठीक ही चल रहा था। 

  पर अचानक पापा को दिमागी रूप से कुछ परेशानी होने लगी। हुआ यूँ कि हमारे पापा अंग्रेज़ मजिस्ट्रेट के अधीन काम करते थे जो उन्हें अपने अनुसार गलत पेपर पर सिग्नेचर करने के लिए बाद्ध्य करता था जो पापा को मंज़ूर नहीं था। और ऐसे  ही विवादों के होते हुए उन्हें एक दिन नौकरी से हटा दिया गया। मैं छोटी थी इसलिए अधिक नहीं जानती पर जो याद है वो ये कि शायद उसके बाद ही अचानक एक दिन पापा घवराये हुए  घर आये और कहने लगे कि दादा पुलिस आरही है और उन्होंने अपनी सारी लॉ की किताबें जलादीं, बस चुप  होगये।घर में सन्नाटा छा गया।  बहुत उपचार कराया लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ। काम पर जाना बंद कर दिया,कभी-कभी अनावश्यक रूप से घर में जो मुझे याद है माँ पर गुस्सा होते,फिर शांत होजाते। बस यहीं से हमारे जीवन की दिशा बदल गयी।

  मुझे अपने पापा के साथ के कुछ मधुर पल भी याद हैं जैसे मुझे शाम को साइकल पे घुमाने लेजाना,शाम को ठंडाई घोटना,कभी भल्ले वाले को बुला लाना घर पर। बुआ को आवाज़ लगाकर बुलाना। पर इस सब के साथ माँ का जीवन अति संघर्षपूर्ण था। तीन लड़कियाँ,पापा का काम छूटना, और सौतेली माँ यानि मेरी दादी का उलाहने देना, आदि से परेशां माँ नानाजी से पत्र द्वारा बतातीं। तो नानाजी को दुखी होकर यह निश्चय लेना पड़ा कि वो माँ सहित हमें अपने पास बुलाएँ, और फिर हमारे भविष्य को सोच कर अपने पास ही बुला लिया। लेकिन हम सबके लिए विशेष रूपसे माँ-पापा के लिए ये निर्णय अधिक परेशानी का था। पापा ने कुछ नहीं कहा वो मिस करते थे। कहते कुछ नहीं कम ही बोलते थे बहुत ही अभावग्रस्त जीवन जीने को विवश हो रहे थे।

  आज हम महसूस कर बहुत दुखी होते हैं। तब तो हम बहुत छोटे थे। इतना ही ज्ञान था कि हमारे पापा की तबियत ठीकनहीं है। यदा-कदा  वो हमारे पास आते थे, तभी की कुछ स्मृतियाँ आज भी तरोताज़ा हैं, जैसे जब वो आते तब चुपचाप आकर छत पर पड़ी कुर्सी पर बैठ  जाते। दौड़ते-भागते जब हम देख लेते तो ख़ुशी से भाग कर माँ आदि सबको बताते, माँ पापा आगये हैं। हम सब उनके काम में लग जाते, उनका बहुत ध्यान रखते। किन्तु ये ख़ुशी अधिक दिन नहीं रहती और वो चले जाते। नानाजी किराये के पैसे दे देते क्योंकि उनके पास पैसे तो होते ही नहीं थे , उन्हीं पैसों में से कुछ पैसे बचा के संभाल के रखते उनसे ही जब मन करता अपने बच्चे परिवार की याद  आती तो फिर हमारे पास,हाथरस आजाते।

  जब आते थे उनका स्वास्थ्य बहुत कमज़ोर होता था। जितने दिन हमारे पास रहते  अच्छी देख-भाल होती तो उनका स्वास्थ्य अच्छा हो जाता था। लेकिन अचानक पता नहीं धौलपुर की हुड़क होती और फिर जाने के लिए  कहने लगते और तब समझाने पर भी नहीं रुकते। नानाजी किराया देते और चले जाते।कुछ दिन वहां रहते किन्तु वहां की मुश्किलों से परेशान होकर पुनः हमारे पास आजाते। लेकिन जब आते थे तो उनकी दशा देख कर बहुत दुःख होता था। टूटा हुआ चश्मा जिसका प्रयोग धागा बाँध कर करते थे। फटे पुराने गंदे कपडे,बढ़ी हुई दाड़ी कि पहचानना मुश्किल होता। नानाजी उसी समय दर्जी बुलाते, कपडे सिलवाते,नाई को बुलाते ,डॉक्टर के पास लेजाकर आँख टेस्ट कराते।चश्मा बनबाते।इस प्रकार पापा की स्थिति ठीक होती।

 पापा की दिनचर्या पूर्णतया नियमित रहती।सुबह चार बजे उठना,टहलने जाना,और वहीँ बगीची पर स्नान करना,ग्यारह साढ़े  ग्यारह बजे तक घर आना,खाना खाना दोपहर में आराम करना और शाम को पुनः घूमने जाना और वहां से नानाजी के ऑफिस  जाना,वहां जाकर ऐल ऐल बी की बुक्स पढ़ना यही उनका क्रम रहता था। कमी थी तो ये कि एक सामान्य व्यक्ति के समान एक नौकरी पैसा जीवन न था। किन्तु स्वाभिमान में कोई कमी न थी, तभी तो अनेकों अभावों के बीच, धौलपुर जाने को तैयार होजाते। 

  जिंदगी के इस पड़ाव पर जब पापा को सोचती हूँ तो मन बहुत व्यथित होता है।  दादी तो मेरी छोटी बहिन को दूध में अफीम भी देने लगी थी जिसका ज्ञान माँ को न था। तब एकदिन पापा की बुआ ने बताया कि  तेरी मौड़ी को वो अफीम दे रही है ताकि वो सोती रहे। इन सब बातों से दुखी हो माँ ने एक बार ये सारी बात हमारे नानाजी से कहीं। परेशां होकर कुछ दिन बाद हमारे नानाजी ने हम सबको अपने पास बुला लिया।लेकिन उसके बाद हम कभी वहां नहीं गए। 

 आज अब मैं सोचती हूँ कि अगर हम आज के समान तब जागरूक होते तो पापा को स्वस्थ कर लेते, हम तो क्या हमारी माँ उस समय बीस-इक्कीस साल की रही होंगी वो भी आज के बच्चों की तरह समझदार तो नहीं थी फिर हम कैसे कुछ ------पर आज मैं इतना तो विश्वासपूर्वक कह सकती हूँ हमारे पापा को भी वो निश्चितरूप से खाने आदि में अफीम देती रही होंगी। जिसके परिणाम स्वरुप पापा शांत व सोचने समझने की शक्ति खो बैठे थे। यहां तक कि  उन्हें पागल जैसे उपेक्षित और अपमानजनक शब्द भी बोले गए। जबकि पागल जैसा सा तो कुछ था ही नहीं। सौतेली माँ यानि हमारी दादी को किसी ने कहा था कि  तुम्हारे एक लड़का होगा वो थे हमारे पापा। इन दादी के छः लड़कियां थीं, अफीम  के ही प्रभाव से हमारे पापा की ऐसी स्थिति हुई होगी। तभी उनके लड़का हुआ। 

 यद्यपि मैं ऐसी दकियानूसी बातों पर विश्वास नहीं करती तथापि जो दिखता है तो सोचने पर विवश हूँ। उनका ये लड़का यानि हमारे चाचा हम चारों बहिन-भाइयों से छोटा है। हमारे आने के बाद हमारे पापा को घर में भी नहीं रहने दिया,मंदिर जिसके दादा स्वयं पुजारी थे वहां रहते थे। हमें नहीं पता वहां उन्होंने कैसे जीवन जीया,नित्यप्रति के कार्य,खाना-नहाना कैसे करते होंगे ! हम सबका ही ये दुर्भाग्य ही था। नानाजी के सहयोग से आज हम सब बहुत ठीक हैं लेकिन पापा का जीवन चलचित्र की भाँति जब सामने घूमता है तो बस कुछ समझ नहीं आता। 

 जब मैं  एम् ए कर स्कूल में पढ़ाने का कार्य कर रही थी तब 1967 में हमें पापा के न रहने का समाचार मिला। वह भी 9 दिन बाद !पापा को केवल प्यार व स्नेह की आवश्यकता थी जो सबको मिलता है। इस तरह माता-पिता, हम बच्चे एक परिवार किन्तु अलग-अलग रह कर जीवन व्यतीत कर रहे थे। हम तो आदरणीय नानाजी के स्नेहिल संरक्षण में थे कि अपने पापा को भी कभी-कभी ही याद करते किन्तु पापा का एकाकी जीवन अति दुर्लभ था। माँ तो अपना दर्द किस से कहतीं,नानी भी नहीं थी,अंदर ही अंदर घुटती रहती थीं। हम चार बहिन-भाई के बीच बड़ी मैं ही हूँ इसलिए मुझे कुछ बातें घर की और पापा के साथ की याद हैं पर बाकी बहिन-भाई को कुछ भी याद नहीं। भाई का तो जन्म भी उस घर में नहीं हुआ था। और अब उसे भी कोविद ने छीन लिया,माँ भी नहीं रहीं।

  हम ही तीनों बहिनें अपना गत-विगत समय को याद कर दुखी होती रहतीं हैं। ये था हमारे "बिलवेड पापा का अनपेक्षित जीवन !!" जिसमें उन्हें उनके  परिवार का भी साथ यदा-कदा ही मिला ।   

                                             **      

                                           





   



Wednesday, 22 November 2023

धन्यवाद प्रभु !!


प्रभु ; आपने तो सब कुछ दिया ,

जीने के समुचित साधन उपलब्ध कराये ,

शान्त्योचित उपकरण भी ! 

फिर भी अशांति !!

प्रभु हर समय यही उलझन ;

ये नहीं,

वो नहीं,

ऐसा क्यों ?

वैसा क्यों ?

उत्तर ----

अरे ! ये कारण तो मैंने नहीं दिए, 

ये तो मन के अंदर से भी नहीं, 

तो क्या बाहर से ?

शायद !

तो इन्हें बाहर करो 

घुसने ही नहीं दो तो 

क्या बचा ?

शांति !!

बस !यही कारण है अशांति का 

बाहर से आने वाली परेशानियों को छोड़ो

शांति का ही वास होने दो !

            ॐ शान्ति शान्ति शान्ति !! 

















 


 

Wednesday, 11 October 2023

गाथा : एक कर्मठ योगी की

 

जन्म तो माता की गोद में ही हुआ ;

चार वर्ष के बाद वह छोड़ गयीं ;

पिता के संरक्षण ने पाला ;

बहुत ही प्यार भरा जीवन !

पिता की सरकारी नौकरी से प्राप्त,पर्याप्त था। 

कि एक अनपेक्षित मोड़ ने -

जीवन की दिशा-दशा ही बदल दी !

छूट गया सब !

पिता का दूसरा विवाह !!

सौतेली माँ का आगमन !

अनचाहे आगमन और उपेक्षित व्यवहार से 

उसका जीवन बिखर गया। 

घर पराया होगया। 

14 वर्ष की आयु में मानसिक आघात था ,

4-5 बार घर छोड़ा,

पहले एक माँ ने छोड़ा 

फिर घर छूटा ,

मिथ्या सम्बधों में भी 3-3 माँओं के आश्रय में 

हायर सेकंडरी तक शिक्षा प्राप्त की,

फिर वे भी छूट गयीं।  

पिता के सहयोग से सरकारी नौकरी भी मिली ,

और अब एक नयी ज़िम्मेदारी !

परिवार ! विवाह हुआ ,

परिवार की ज़िम्मेदारी,और फिर -

केवल ज़िम्मेदारी का अहसास 

मोह रहित जीवन !

कर्म-निर्वाह में रत ,

कहीं भी कोई उपेक्षा ,अवहेलना नहीं,

संतान के अनपेक्षित दुःख !

40 वर्ष का अनवरत कर्तव्य-निर्वाह

किन्तु- 

जब संतान के सुख देखने का समय आया; 

तो सब कुछ बिना देखे ही योगी ने 

इस दुनिया से विदा लेली  !

एक कर्तव्यपरायण कर्म-योगी !

निरंतर कर्तव्य-पथ पर सवार 

अंतहीन दिशा की ओर बढ़ चला ;

दुखों को भी छोड़ा ,

सुखों को भी छोड़ा 

कर्तव्य और अधिकार

सबसे मुँहु मोड़ कर विरक्त-भाव से। 

कोई ग़म नहीं;कोई सुख नहीं;कोई दुःख नहीं। 

और चला गया अपने  मुक्ति-पथ पर !!

      (अनु और श्वेता के पिता )

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मेरी नायिका - मेरी पुत्र-वधु 

कर्तव्य और उत्तरदायित्व,दायित्व,ड्यूटी,मान-सम्मान,अधिकार और स्वाभिमान के बीच झूलती वो वृद्धा !!

आज बच्चे ही उसका जीवन हैं। यानि आज असहाय होने की स्थिति में वे उसकी देख-भाल करते हैं। तो लगता है वो स्वयं उनके लिए बोझ है। स्वाभिमान को चोट तो लगती है,लाचारगी,विवशता जैसी स्थिति होजाती है। जो स्वाभाविक भी है।

घुटने का ऑप्रेशन  

वो नायिका सुबह जल्दी उठती है,अलार्म लगाकर केवल अपने घर में रहने वाली उस वृद्धा को चाय बनाने के लिए। और तब वो वृद्धा महसूस करती है कि केवल उस के ही लिए तो उठी है। फिर ९-१० बजे नाश्ता सर्व करती,मध्याह्न दोपहर भोजन की व्यवस्था सिर्फ उसी के लिए करती,क्योंकि वो स्वयं दोपहर में नहीं खाती । और फिर रात्रि ---

इस सबके इतर वो वृद्धा अपने स्वाभिमान को भूल कर,शांत रहकर निश्चिन्त होकर समय व्यतीत करती। सब कुछ प्राप्य किन्तु उदास,असहाय,पराश्रित !!इस जीवन को कैसे पारिभाषित किया जाय। असहाय विवश होने की पीड़ा तो नहीं भूलती। मानसिक अंतर्द्वंद्व तो बहुत सालता। किंतु दूसरा कोई विकल्प भी  नहीं। उत्तरदायित्व पूरे करना दायित्व निभाना ही तो उस वृद्धा के लिए पर्याप्त नहीं होता। उसका मन भी बहुत कुछ अभाव महसूस करता है । 

 ज़िंदगी के सफर में व्यक्ति औफिस जाता है,ड्यूटी निभाता है,वेतन पाता है बस ! इस बीच और कोई विशेष सम्बन्ध नहीं होता। वही उस वृद्धा को महसूस होने लगा है। इस अपरिहार्य परिस्थिति से मुक्ति कैसे संभव है। प्यार,सम्मान,आदर व समर्पण को स्थान कहाँ है ! बहुत कुछ विचार करते हुए वो वृद्धा शांत और गम्भीर बने रहने का प्रयास करती है। 

पर कभी-कभी इस सबके बीच संतुलन डगमगाता सा प्रतीत होता है। हर पल, हर क्षण  दूभर -------!!


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अप्रेल 2024 

मेरे नी (आँतों)का ऑपरेशन 


पर अभी कुछ और भी बाकी था या अभी है नहीं पता। क्या-क्या इसे अभी और  झेलना बाकी है मेरे लिए,ये तो ईश्वर ही जाने। मेरी इस बीमारी में तो मेरी इस नायिका ने अपनी गहन परीक्षा दी और अविश्वसनीय त्याग तपस्या ने तो उसे बहुत बड़ा कद प्रदान कर दिया। मुझे नहीं पता इसने मेरे लिए क्या-क्या किया,प्रायः मैं  बेहोश ही रही,बाद में इसने और मेरी बेटी और बहिन ने बताया कि किस प्रकार दिन-रात दौड़-भाग कर  मुझे मौत के घर से खींच कर बाहर लेआई। क्या नहीं किया इसने यानि सब बेहोशी की अवस्था में जो करना था सब किया। भगवान की दया इस पर सदैव बनी रहे। 

                                              **

 



 

      





 




 



    

Saturday, 23 September 2023

मुग्धा अहीरन 

उपाय सुनकर वह भोली-भाली,सरल चित्त महिला-
बड़ी प्रसन्न हुई अब वो समय पर दूध लाती,
ब्राह्मण की डाँट से भी बच गयी। 
ब्राह्मण भी प्रसन्न। 

एक दिन बोला - अम्मा,अब समय पर दूध कैसे लापाती हो ?
महिला बोली-
"आपने ही तो कहा था -
ईश्वर का नाम लेकर तो लोग समुद्र पार कर जाते हैं।"
तो बस,मैंने वही किया। 
अब मैं किसी यात्री,मल्लाह का इन्तज़ार नहीं करती -
ईश्वर का नाम लेती हूँ और नदी पार कर लेती हूँ।"
ब्राह्मण को आश्चर्य हुआ,
बोला - 
मुझे दिखाओ कैसे पार करती हो !

अहीरन ने उसे साथ लिया और उसके सामने 
भगवान का नाम लेकर नदी पर चलने लगी 
पीछे मुड़ कर देखा - 
बोली - महाराज, अब होगया विश्वास ?

उस मुग्धा अहीरन के आगे ब्राह्मण नतमस्तक-
हैरान-परेशान , चमत्कृत !! सोचा -
"मैं तो अपने कपड़े उठा कर भीगने के भय से दूर खड़ा था। 
और 
ये मेरी एक छोटी सी चेतावनी से नदी पार कर गयी। 
और कुछ नहीं बिगड़ा !!
 
ईश्वर के प्रति अटूट आस्था ने -
अहीरन के प्रति ब्राह्मण को अति श्रद्धानत कर दिया।

(संकलित कथानक का काव्य रूप )


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Monday, 21 August 2023

स्वाभिमान

 स्वाभिमान 

   ये शब्द जो आज बात-बात में अंग्रेजी के ईगो शब्द से जाना जाता है,अपने सही अर्थ में स्वाभिमान तो कतई नहीं है। जिस रूप में ये शब्द आज जीया जा रहा है मेरे लिए एक भ्रामकता प्रस्तुत करने वाला है क्योंकि आज जो मैं  देख रही हूँ और समझ पा रही  हूँ वो स्वाभिमान का सकारात्मक अर्थ नहीं है बल्कि इसकी आड़ में एक विकृत रूप है।अब स्वाभिमान अपने छद्म रूप में घमंड और अहं का रूप ले चुका है। 

 मैं झुकने वाला/वाली नहीं हूँ 'क्या ये स्वाभिमान है ? क्या विनत होना,विनम्र होना स्वाभिमान में नहीं आता। घमंडी,अभिमानी, ईगोपरस्त व्यक्ति ही ऐसा समझता है। स्वाभिमानी व्यक्ति तो दूसरे व्यक्ति के स्वाभिमान का भी ध्यान रखता है। किसी को दुःख पहुँचाकर वह क्षमा माँगने की हिम्मत भी रखता है और सम्बन्धों को कभी ख़राब नहीं होने देता। लेकिन ईगो में तो टकराव  की स्थिति पैदा होती है। ज़रा-ज़रा  सी बात पर ईगो हर्ट होना स्वाभिमान को चोटिल समझना एकदम गलत है। 

स्वाभिमान आत्मविश्वास जगाता है ,सभ्य समाज में बैठने योग्य अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाता है। चतुर्दिक वातावरण को ओजमय बनाता है वातावरण को सकारात्मक ऊर्जा से भर देता है। इसके विपरीत ईगोइष्ट तो नकारात्मकता का ही प्रसार करता है।व्यक्तित्व नकारात्मक ऊर्जा से पूरित होकर अति आत्मविश्वास में आकर निरर्थक चीखना चिल्लाना शुरू कर देता है। सामने वाला भी उसकी उपेक्षा करने लगता है। अहंकार के आते ही व्यक्ति का धन-सम्पत्ति सब कुछ भगवान् छीन लेते हैं । 

अहंकार में व्यक्ति सामाजिक प्रतिष्ठा,यश सब कुछ गँवा देता है। धन-रूप,पद,बुद्धि, विद्या, जप-तप दान त्याग लोकप्रियता प्रशंसा आदि अहंकार के माध्यम हैं। इनमें से कोई एक भी गुण अभिमानी के लिया घातक होता है और व्यक्ति का विनाश निश्चित है । अच्छे कार्य करने का भी यदि अभिमान है तो वह भी विनाशक है। इससे सतर्क  रहने की हरपल हरक्षण आवश्यकता है।  


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Monday, 31 July 2023

: मेरी नायिका : मेरी पुत्री

मेरी नायिका ---मेरी पुत्री  (आज के परिप्रेक्ष्य में)

वह भूल चुकी थी सब कुछ। गत-विगत होचुका था।अच्छे पद पर काम कर रही थी जिसे छोड़ना पड़ा।अब एक नए काम की तलाश थी काम भी मिल गया एक अच्छी कंपनी में।अच्छा समय नहीं रहता तो बुरा भी नहीं रहेगा यही सोच कर जुट गयी अपने काम में।अपने माता-पिता के साथ रहकर संतोष था किन्तु भारतीय संस्कार कभी-कभी उसे बेचैन करते थे।प्रतीक्षा थी अच्छे समय की उसे पूर्ण विश्वास था कि वो अवश्य कभी लौट कर आयेगा उसकी जिंदगी में।

 किन्तु अचानक एक दिन मिले एक अदालती फरमान के लिफाफे ने उसे हिला दिया,टूट गयी,धड़ाम से ज़मीन पर गिर पड़ी बेहोश होगयी।उठी तत्काल,सँभाला  अपने आपको,लिफाफा खोला,पढ़ा आश्चर्य ! बिना ही हस्ताक्षर के सम्बन्ध विच्छेद!अब निश्चित तारीख पर कोर्ट में उपस्थित  होना था।इस तरह कोर्ट कचहरी का सिलसिला शुरू।लम्बा समय निकल गया चक्कर लगाते-लगाते, हैरान-परेशां !! समझ नहीं आया क्या करे कब तक ।

 अगली तारीख आने से पहले उसने कोर्ट में एक याचिका डाली थी जिसमें विवाह में दिए हुए सामान की लिस्ट के साथ उचित धन राशि की मांग की गयी थी।जिसके जबाव में एक तारीख मिली,जिस पर जाना था उसे।जाने के लिए तैयार थी ऑटो भी आगया कि अचानक उसमें एक नयी ऊर्जा उत्पन्न हुई,सोचा क्यों उसी शृंखला  में बंध कर समय, पैसा, दिमाग की शांति बर्बाद करूँ और ऑटोवाले  को कुछ पैसे देकर वापस कर दिया।

बैठ कर शांति पूर्वक सोचा,तलाक के पेपर तो उसके हाथ में थे,खड़ी हुई कमरे में और ज़ोरज़ोर से चीखी।हॉल के खिड़की दरवाज़े बंद कर ज़ोर ज़ोर से चीखी,नहीं चाहिए मुझे ऐसा कायर,बुज़दिल मर्द, नहीं लगाने मुझे कोर्ट कचहरी के चक्कर,नहीं चाहिए कोई सामान, नहीं चाहिए कोई एल्युमिनी ! और इस तरह  कोर्ट जाने का इरादा सदा-सदा के लिए छोड़ दिया।सोचा अब मैं आज़ाद होगयी,सब बंधनों से मुक्त,एक नया चमकता भविष्य है मेरे सामने।सोच लूँगी किसी जन्म का कर्ज़ा था चुका दिया,भगवान् की यही इच्छा थी।इस प्रकार उसके बिना हस्ताक्षर के उसे सारे झंझटों और परेशानियों से  मुक्ति मिल गयी। 

अपने मातापिता के साथ,उनकी देख भाल करते हुए अपने कार्यालय के काम में जुट गयी।काम करते हुए अपनी माँ के आग्रह से अब उसने मेट्रीमोनिअल के माध्यम से एक सुयोग्य जीवन साथी तलाशा,बात-चीत की,सब तरह से संतुष्ट होकर उसके माता-पिता से  संपर्क कर अपने माता पिता से संपर्क करवा कर उचित समय पर विधि पूर्वक अदालत में दोनों परिवारों के समक्ष कानूनी तौर से विवाह संपन्न किया। 

आज अपनी हिम्मत से,अपनी सूझ-बूझ से दकियानूसी परम्पराओं को तोड़ कर उसने एक नए सिरे से जीवन की शुरूवात की और अब अपने नए परिवार के साथ सुखी और प्रसन्न है।

ये है मेरी नायिका जिसने अपने जीवन को सँवारा बिना किसी लोक-लाज की चिंता किये।समय की आज यही पुकार है।


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Thursday, 20 July 2023

क्योंकि मैं अपनी ही नहीं सुनती

 क्योंकि मैं अपनी ही नहीं सुनती 

          (आत्म-समीक्षा) 

 

हरबार मन को समझाती हूँ कि अपने को स्वस्थ रखना है तो भूल जा अपना पास्ट,भूल जा कि तू अब वही सब कर सकती है जो अब तक शौक से,बिना किसी परेशानी  के कर पायी ,अब भी कर सकती है। फिर एक तो स्वभाव और फिर शौक काम करने का ,मन नहीं मानता और -------।

कई बार सोचा कि काम करना छोड़ूँ यानि किसी का मुँह देखूँ,आदत ही नहीं किसी से कुछ भी काम के लिए कहने की, तो मुश्किल होती थी ,और फिर चल पड़ती।  सच तो ये है कि ये तो भगवान् भी नहीं चाहते  कि बिना काम किये बैठे रहो,कुछ तो करना होगा बड़ा करने की सामर्थ्य नहीं तो हल्का काम करो पर कुछ तो करना होगा,सोचा कैसे इस आदत से निवृत्ति पाऊँ ,क्या करूँ!पर समाधान नहीं मिला,बार बार मन कहता ,सब छोड़ो,सब हो जायेगा।जब मन कहता है मन को नियंत्रण में रखो,चिंता न करो,औरों को मौका दो,मोह ममता का ही तो रूप है ये कि मन चाहा काम करो, खर्चा करके नहीं,हाथ पैर चला कर लेकिन वो रास्ता नहीं सूझता।और फिर चल देती उसी राह पर !

लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ।मेरे मन की उलझन,परेशानी,समस्या से मुक्ति दिलाने भगवान् ने सख्त रास्ता दिखाकर मार्ग दर्शन किया।असल में घर में साफ़ सफाई का काम शुरू हुआ, उम्र और शारीरिक क्षमता को ध्यान में रखते हुए मन तैयार नहीं था पर बच्चों का मन था,सफाई की आवश्यकता भी थी इसलिए काम शुरू हुआ।

भगवान  का यही मार्गदर्शन था,अवसर था थोड़ा सोचने समझने का लेकिन मनुष्य की यही कमी है कि ठीक से सोचता विचारता नहीं।बस स्वभाव के वशीभूत सामान को हटाना ,लगाना सब में दौड़ती भागती रही,और बस मेरे एक  घुटने ने अचानक साथ छोड़ दिया ,बहुत तकलीफ होगयी,असहाय महसूस करने लगी,बहुत परेशान होगयी,किसी से काम न लेने की आदत कमज़ोर होगयी। वाशरूम तक  के लिए दिन में ३-४ बार बहू को बुलाना पड़ा सहारे के लिए ,अंत में सोचा मेडिकल रिम्बरसमेंट तो होता ही है इसलिए होस्पिटलाइज़्ड होगयी ,एक वीक में सुधार हुआ चलने फिरने लायक हुई तो घर आगयी।(१७फरबरी से २३ फरबरी )

तब से आज तक भगवान ने केवल इस लायक रखा कि अपना काम कर पाऊँ। लेकिन तकलीफ है।समय आज ऐसा है कि अस्पताल,डॉ.पर विश्वास कर पाना मुश्किल होगया है। पर विवशता और मजबूरी अस्पताल और डॉ तक पहुँचा ही देती है। कुछ दिन और प्रतीक्षा की कि शायद अपने आप तकलीफ दूर हो,पर ऐसा हुआ नहीं।अंत में बेटे से कहा बेटा अब तो लगता है घुटने के लिए कुछ करना ही पड़ेगा। तब उसने अपने मित्र और अपने कुछ जानकारों से बात की।उनमें से एक मित्र ने एक डॉ का पता बताया।उसने कहा - अपनी मम्मी का उपचार कराया,अच्छा डॉ है कहीं और जाने की ज़रूरत नहीं।बेटे ने नाम पता लेकर गूगल सर्च किया ,डॉ से बात हुई पता चला वह मेरा स्टूडेंट है,कहा वो मेरी मैंम हैं ,पढ़ाया है मुझे। बेटे ने जब बताया तो अटूट विश्वास के साथ उससे समय माँगा,मीटिंग की ,उससे मिलकर मुझे और अधिक संतोष हुआ।उसने बताया-45 मिनट की सर्जरी है एक दिन  एडमीशन टेस्ट,दूसरे दिन सर्जरी तीसरे दिन डिस्चार्ज भी हो सकते हैं.उसी समय अपॉइटमेंट लिया और 12 जुलाई को एडमिट हो गयी ,13 जुलाई को सर्जरी और 14जुलाई को  डिस्चार्ज कर दिया।

घर आने की हिम्मत न थी दर्द बहुत था चलने मैं बहुत तकलीफ थी,पर डॉ की हिम्मत देने से हिम्मत की और बच्चों के सहारे से झीना चढ़ कर घर आगयी।आज एक महीना होगया तकलीफ बहुत कम है पर अभी भी बहुत है। डॉ ने कहा है एज फैक्टर है और २-३ महीने का समय लगेगा।पर संतोष है।

बात वही कि "मैं अपनी ही नहीं सुनती"। आज अपनी नहीं,ज़रुरत की सुनी और मुझे सहायता के लिए बोलने,कहने की आदत स्वभाव में आगयी।आज जितना संभव है अपना काम स्वयं कर पाती हूँ बाकी बहू-बेटे का सहारा लेती हूँ।संकोच होता है पर कह पाती हूँ कोई परेशानी नहीं।

कभी-कभी स्वाभिमान इतना अधिक आड़े आता है कि फिर जिंदगी तकलीफ उठाने के बाद अपना रास्ता स्वतः ढूँढ लेती है।स्वाभिमान के स्थान पर इसे 'अहं' भी कहा जा सकता है।मुख्य रूप से परेशानी का कारण भी यही बनता है। 

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Saturday, 8 July 2023

दादी-पोती संवाद ( हास्य प्रसंग )

 दादी-पोती संवाद ( हास्य प्रसंग )

कई महीने के बाद मध्य रात्रि 2 बजे पोती अपने हॉस्टल से छुट्टियाँ बिताने घर आयी थी।थकी हुई थी,अपनी दादी से मिलने के बाद तुरंत सोगई।सुबह देर तक सोती रही कि अचानक दादी की प्यार भरी कड़क आवाज़ ने  सोती हुई बच्ची को कुलमुला दिया पुनः आवाज़ दी -अरी बिटिया अभी उठी नहीं! उठके आ मेरा काम कर,-2 दिन को आयी है, दादी याद करेगी फिर - सुनते ही पोती दौड़ी-दौड़ी आयी - बोलो दादी,क्या काम है,जल्दी बताओ मुझे नींद आरही है।  

दादी (हँसती हुई) -अरे अभी सोना बाकी है,अच्छा जा ज़रा मेरी लठिया तो ला,जाना है पड़ौस में भजन कीर्तन है,देर होरही है।

पोती - लो दादी,अब मैं जाऊँ ? 

दादी - अरे मेरा चस्मा तो लाके दे।

पोती-ओके दादी, ये लो चश्मा अब जाऊँ ? 

दादी - ठैर तो लाली, मेरी लम्बी वाली ड्रेस तो ला,जो तेरी माँ ने मंगाई थी।(पहनी हुई ड्रैस की ओर)इशारा कर,ये पहनके थोड़े ही जाऊँगी।

पोती-ओके दादी,कहाँ रखी है।

दादी -वो मेरी  अलवारी में कपड़ों के नीचे चौथे नंबर पै रखी है,जा दौड़के ला,भजन शुरू हो जायेँगे,देर हो रही है।

पोती -लो दादी,अब मैं जाऊँ? 

दादी-अरी मेरा बटुआ तो ला,पैसे भी तो चढ़ाने को चाहिए और ले,तनिक जाकर 2 केले भी मदर डेरी से दौड़के लादे।

पोती हँसते हुए- दादी,मेरी सारी नींद उड़ादी,अब जाऊँ ?

 दादी-अरी बिटिया इतना काम कर दिया,अब मुझे पड़ौसन के घर छोड़ भी आ,बिटिया चौथी मंजिल  पर घर है,कैसे जा पाऊँगी, कहीं गिर गयी तो ---!

पोती- चलो दादी वहाँ भी छोड़ आती हूँ।पोती (छोड़ कर) बोली- अब जाऊँ ?

 अरी थोड़ा बैठ ले,मत्था टेक, भजन सुन,मुझे वापस भी ले चलना,आधा घंटे बाद।(पोती बैठ जाती है)

दादी-चल अब घर चल,चल कर अब सोजाना, नींद पूरी कर लेना,कितनी अच्छी बिटिया है।

पोती (हँसती है),हाथ पकड़ कर,आदर-प्यार से घर ले जाती है।  

अब जाकर जो उसकी हँसी का गुब्बारा फूटा - ज़ोर-ज़ोर से अकेले ही हँसने लगती है।और जब सबने हँसने का कारण पूछा तो  बैठ कर,हँसी के मारे उस से बोला ही न जाये फिर  दादी की ओर देखते हुए घर में सबको सारा किस्सा सुना-सुना कर खूब मजे ले लेकर हँसाया। फिर हँसते हुए-  

बोली दादी- अब जाऊँ सोने ? 

दादी भी पल्लू से मुँहु ढक कर मुस्कराती हैं -------- 

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Tuesday, 4 July 2023

मेरी माँ (जीवन के कुछ अनछुए अंश )

         मेरी माँ (जीवन के कुछ अनछुए अंश ) 

आज माँ बहुत याद आरही थीं तो वह भी आज मेरी लेखनी का आलम्बन बन गयीं और लिखने बैठ गयी उनकी आत्म कथा अपने शब्दों में - जितना बेटी होने के नाते समझ पायी कि विभिन्न परिस्थितियों में वो क्या सोचती होंगीं कल्पना कर लिखने का प्रयास किया है लेकिन बाहरीतौर पर आज इस उम्र में जो समझ पारही हूँ वो इस प्रकार है -(  जो सुना बचपन में और जो देखा आँखों से और जो समझ पारही  हूँ इस पड़ाव पर आकर --)

16 वर्ष की थीं,तब माँ का विवाह हुआ था,धौलपुर के उच्च घराने में जिनके नाम के आगे "रईस" लिखा जाता था।24 वर्ष की अवस्था तक हम तीन बहिनों  का जन्म हो चुका था।इस बीच पापा का स्वास्थ्य ऐसा होगया कि वो काम पर भी नहीं जा पाये, बी ए, ऐल  ऐल बी थे पापा।दादा ने बहुत इलाज कराया मानसिक चिकित्सक से भी कराया लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ तब नानाजी ने हमें हाथरस ही बुला लिया आने के कुछ समय बाद हमारे एक भाई ने जन्म लिया। हम सबकी पढ़ाई नानाजी के पास हो रही थी।भाई भी स्कूल जाने लगा। 

तब नानाजी ने माँ की पढ़ाई के बारे में सोचा और इस तरह धीरे-धीरे माँ ने बी ए तक की शिक्षा प्राप्त करली। अब नानाजी चाहने लगे कि माँ को कोई प्रशिक्षण कोर्स भी  कराया जाय जिस से वो पैरों पर खड़ी हो स्वावलम्बी बने।समय आने पर अपने बच्चों की आगे देख-भाल कर सकें। ये समय माँ के लिए  कितना कठिन रहा होगा।लेकिन वो हालतों को देखते हुए तैयार होगयीं।

आज इस बात का एहसास कर पारही हूँ।अंततः नानाजी के एक मित्र के सहयोग से माँ लखनऊ तीन महीने की ट्रेनिंग के लिए गयीं, जहां से उन्हें सोशल वर्कर का प्रमाणपत्र मिला।वहां से लौट कर उन्हें महिला अस्पताल में फेमिली प्लानिंग डिपार्टमेंट में नियुक्ति मिली।इस कार्य  के लिए माँ को घर से निकलना,नौकरी करने के लिए गॉंव-गाँव घर-घर  घूमना होता था।हर परिवार में जा-जा कर महिलाओं को परिवार नियोजन के बारे में समझाना कितना कठिन रहा होगा वो माँ ही जानती होंगी।इस योजना के लाभ हानि समझाना, उन अशिक्षित महिलाओं को विश्वास में लेना कितना जटिल था कई बार बहुत उल्टा-पुल्टा भी सुनना  पड़ता था पर धीरे धीरे माँ को सफलता मिलती गयी।

सरकारी आदेश के अनुसार एक महीने में २-3 केस लाने  होते थे।भगवान की दया से पुरुष सहकर्मियों से उन्हें इस काम में सहायता मिल जाती थी।तेज धूप,बारिश में घर-घर विजिट करना, दूभर कार्य था।माँ के पैरों में छाले पड़ जाते थे।तब जूते चप्पल भी आज की तरह सुविधा जनक नहीं मिलते थे।सुबह से निकल कर दो पहर के २-3 बज जाते थे। वापिसी के लिए कभी इक्का कभी ताँगा मिलता था।तब तक हम उनकी प्रतीक्षा करते थे।उस पर भी यह कि माँ बाहर का कुछ नहीं खातीं थीं  पानी तक नहीं पीतीं थीं। कभी-कभी किसी के यहाँ स्वच्छता  का विश्वास होता तो पानी लस्सी ग्रहण कर लेती थीं।बस नानाजी का सहारा था कि वह ये सब कर पायीं। 

तब माँ की मानसिक पीड़ा का अनुमान हम नहीं लगा पाते थे। पापा के विषय में कितना कुछ मन में सोचती होंगी,नहीं समझ पाते थे।अपने मन की बात वो किस से करतीं,बच्चों से नहीं,पिता से नहीं,नानी बहुत पहले ही चली गयीं थीं।बाकी भाभी भाई से भी क्या और कैसे ----कभी-कभी पापा आते,हमें अच्छा लगता।अपनी परेशानियां बताते लेकिन अधिक नहीं और फिर धौलपुर जाने के लिए कहते और चले जाते थे।माँ से कहते तुमने पढ़ाई करली है पर नौकरी मत करना। छुप-छुपा कर नौकरी के लिए जातीं। पापा जब हमारे पास होते तो घूमने जाते,बगीची जाते, स्नान आदि वहीँ करते।हमें देख कर खुश होते पर बात बहुत कम करते।उनके सामने हम बच्चे कभी बीमार होते तो  बाजार से दवा भी लाते।पैसे नानाजी देते रहते थे।माँ का मन उस समय क्या सोचता होगा,कितनी  दुखी होतीं होंगी,अकाल्पनिक है।

इस तरह पापा का सामीप्य या प्यार स्नेह कुछ-कुछ अंतराल के बाद मिलता रहता।माँ को भी पापा को इतना भर ही देखने का लाभ हासिल हुआ कि अचानक वो भी सब समाप्त होगया। खबर मिली मामाजी के एक मित्रसे जो धौलपुर वासी थे,उनके ऑफिस में ही कार्य रत थे,उन्होंने बताया कि पापा हमें छोड़ सदा के लिए भगवान् के पास चले गए। टूट गयीं माँ और हम सब।संभाला अपने आपको,नानाजी का वरद  हस्त तो था ही और उससे भी अधिक भगवान् के प्रति विश्वास सर्वोपरि !!   

शांत मन से माँ हमारे बारे में,हमारी शादी के बारे में चिंता करतीं रहती होंगी।इन्हीं सब चिंताओं के कारण  वो बीमार भी रहने लगीं थीं।सारा शरीर सूज जाता था , स्नोफीलिया की भी शिकायत होगयी,इलाज होता रहा,थोड़ा बहुत लाभ  भी होता रहता पर किसी तरह सरकारी सेवा चलती रही।

हम सबकी शादी भी होगयी।पर भाई की करने से पहले नानाजी भी भगवान् के पास चले गए।बाद में भाई की भी शादी मामाजी के सहयोग से होगयी।उसके कुछ समय बाद माँ रिटायर हुईं।किराये के मकान को खाली कर अब वो भाई के पास रहने लगीं थीं।दुखम सुखम समय गुज़रता रहा,नाती पोते के साथ खुशी से समय व्यतीत होता रहा,पर अधिक समय नहीं गुजार पायीं,और वृन्द्रावन में जाकर आश्रम में रहने लगीं।जयपुर जातीं-आतीं रहतीं थीं।सरकार से पेंशन मिलती थी,सेविंग थी,उससे समय व्यतीत होता रहा। कभी बेटियों के पास भी हो आतीं।इस तरह 87 वर्ष की आयु में एक बार जब जयपुर गयीं तो पुनः लौटना नहीं हुआ।

जयपुर में दोपहर मंदिर से दर्शन कर लौटीं,बहू के कथनानुसार माँ ने खाना खाया और सोगयीं।सब सोगये।घर में जब शाम बहू उठी तो देखा,माँ उल्टी करके सोई  हुईं थीं,पता नहीं कब उल्टी हुई, कब क्या हुआ। भाई को फोन कर ऑफिस से बुलाया।अस्पताल लेगये,बस वहां 15 दिन बेहोशी में ही रहीं और एक सुबह उनकी आत्मा परमात्मा में विलीन होगयी।हम उस समय 2 बहिनें पास थीं पर माँ को कुछ नहीं ज्ञात था। हमारे सर से एक आखिरी साया भी सदा के लिए हमसे छूट गया।संक्षेप में ये था हमारी माँ का जीवन के अनछुए अंश --------!! 

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