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Tuesday, 22 September 2026

जीवन के आखिरी पड़ाव पर उमड़ी कुछ इंद्र धनुषी यादें -

बाल्यकाल 

हाँ राजे !
वही शाम ; आज कितनी भिन्न है !
वो शाम जब चिड़िया की तरह फुदकती थी ,
ऊपर नीचे बंदरों के बीच खेलती , उन्हें खों-खों कर चिढ़ाती ,
आज थोड़ी अलग है -
किशोरावस्था 

वही शाम ;
नित्य स्कूल जाना,गृह - कार्य करना ,
अँधेरा होने पर ,लाल टैन की रौशनी में पढ़ाई करना ,
घर के काम में सहायता करना - 
और लगभग ११ बजे तक अपने हाथ - पैर चमका कर ,
पुनः पढाई का काम पूरा करना -
BA ,MA तक की पढ़ाई पूरी करना ।

और पुनः वही शाम : जीवन का संध्या काल !
गृहस्थ जीवन की शामें ,
गुजारीं पति के साथ !
बच्चों के साथ गुजरा समय ,
अपने कार्यरत जीवन की आपा - धापी,
व्यस्तता अपने चरम पर और 

संध्या काल का ढलना -

और वही शामें !
पतिविहीन जीवन की सूनी शामें ,
आती रहीं जाती रहीं। 
अपने स्वास्थ्य सम्बधी झटकों से पीड़ित शामें ,

लेकिन ये शामें एक नया रूप लेकर आयीं,
बच्चे का ऑफिस,शाम को आना ,
डिनर करना ,स्टडी रूम में काम करना ,
और फिर वॉक के लिए जाना। 

और अब ! प्रौढ़ावस्था !
अपना निजी समय ,
अपना बैड ठीक करना ,
७ . ३० तक बैड पर आराम की मुद्रा में ,
यू -ट्यूब पर कुछ रोचक समाचार ,
एक धारावाहिक देखना :
बच्चों के वॉकिंग से लौटने की प्रतीक्षा ,
९.३०-१०.३० तक निद्रा देवी की गोद में,
और यही नरंतरता का क्रम अनिश्चितकाल तक------! 

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Monday, 31 August 2026

जीने के कुछ आधार स्तम्भ ,बिंदु ,विचार

 जीवन के कुछ महत्त्वपूर्ण आधार बिंदु 

जब मैं कक्षा छह में थी,परिवार के साथ गंगा स्नान के लिए जाना हुआ बचपन में सुना था कि गंगा नहाने से सभी पाप नष्ट होजाते हैं।तभी मैंने सोचा इसका मतलब मेरे अबतक के सभी पाप ख़तम।अब इसी बात का ध्यान रखूँगी कि अब कुछ भी  ग़लत न करूँ,और मैंने इस बात का पूरा-पूरा ध्यान भी रखा तथापि मनुष्य गलतियों  का पुतला है ,मैंने भी जाने-अनजाने भूल कीं होंगी पर याद नहीं। 

स्मरणीय कुछ यादें -

१ -जिन्हें मैंने अपने जीवन का आधार बनाया एक प्रकार से संकल्प ही था। जब मैं ग्यारहवीं में थी तब गर्मी की छुट्टियों में मांमांजी के पास जयपुर जाना हुआ,पूरा संदर्भ प्रसंग मुझे याद नहीं पर एक दिन मांमां  जी ने अपने चिर मित्र के बारे में जो कहा सुनकर मैं चकित होगयी,विश्वास ही नहीं हुआ।उन्होंने बताया कि उनके मित्र  ने बोला कि 'आज तक मैंने कभी कोई पाप नहीं किया,कभी झूठ नहीं बोला ,किसी का दिल नहीं दुखाया,किसी को कभी कोई कष्ट नहीं दिया।सुन कर मुझे बहुत अच्छा लगा ,आश्चर्य नहीं हुआ,लगा कि ये तो कोई मुश्किल काम नहीं।सीधे-सरल रास्ते  पर चलना ही तो है।उसी समय संकल्प किया मैं इसी रास्ते पर चलूँगी।और वैसा प्रयत्न भी किया।अगर कभी मुझे लगा कि अमुक इंसान को मेरे व्यवहार से उसे बुरा लगा होगा तो तुरंत मैंने क्षमा याचना की और तुरंत अपने परेशां मन को शांत और निर्मल बनाया। तब मैंने ये नहीं देखा कि अमुक मुझसे छोटा है या बड़ा। इस संकल्प में भगवान ने सदैव मेरी सहायता की इसके बिना तो मैं ऐसा कभी नहीं कर पाती।यदा - कदा मैंने अपने ही बच्चों को कुछ अधिक  ही डाँटा ,मुझे दुःख भी हुआ तब बाद में   क्षमा  याचना कर बच्चों और खुद को शांत भी किया,तथापि मन आज भी दुखी हो जाता सोच कर।इस प्रकार सदैव सीधे और सरलता के साथ जीवन जीने की कोशिश की।  

२ -कई बार कुछ घटनाएँ ऐसी हुईं जब मुझे लगा कि मेरी इस ड्यूटी से किसी का कुछ अहित हो सकता है जैसे - 

मैं एक अच्छे विद्यालय में कार्य-रत थी,अच्छे पद पर थी इसलिए कुछ कार्य अधिक ज़िम्मेदारी के भी करने होते थे,कभी ऐसे समय मुझे अपमानित भी होना पड़ता था। एक बार किसी के अपमानजनक शब्दों ने मुझे अधिक आहत किया तो मुझे अपने सीनियर से शिकायत करनी पड़ी। बात इतनी बढ़ गयी कि प्रबंधक समिति तक पहुँच गयी।मुझे बुलाया गया। विस्तार से सब बात पूछी ,मैंने सब कुछ ईमानदारी से बताया। मुझसे कहा गया कि आप ये सब लिख कर दीजिये। मैं थोड़ा हिचकिचाई ,वे बोले घबराने की कोई बात नहीं,कोई कार्यवाही तो तभी हो पायेगी। मैने बड़े विनम्र स्वर में कहा - कृपया कोई बड़ी कार्यवाही न करें।पर मुझे बुरा लगा,मन को तकलीफ  भी हुई इसलिए शिकायत करनी पड़ी।इस पर सर ने कहा -कोई बात नहीं ,आप लिखिए।बहुत ही बेचैनी और घबराहट के साथ मैंने सादा पेपर पर अनौपचारिक तरीके से लिख दिया जिसमें स्पष्टतः लिखा कि मैं उनका कुछ अहित नहीं चाहती।लिखकर हस्ताक्षर के साथ वह पेपर मैंने ऑफिस में दे दिया।बाद में मैंने सोचा शायद मुझे इतना आवेश में नहीं आना था क्योंकि परिणाम वही हुआ जिसका मुझे अनुमान था। तब से और अधिक शांत और गंभीरता से कार्य करने का संकल्प किया।और पूरा सेवा कार्य काल मैंने बहुत ही सम्मानजनक तरीके से संपन्न किया।आजतक के जीवन काल में मैंने कभी किसी पर क्रोध नहीं किया। इसका मतलब यह भी नहीं कि गुस्सा आया ही नहीं आया लेकिन कभी किसी ने पहचाना नहीं।स्वयं को ऐसा बनाये रखा जैसे कुछ हुआ ही नहीं। 

अपना समझ कर कभी किसी से कुछ कहा भी लेकिन जब मुझे लगा उसे वे अपनापन में कही बातें उन्हें पराए जैसी लगीं तो वह भी कहना बंद कर दिया।और अपनी ही ग़लती समझ वह सब हमेशां के लिए छोड़ दिया। 

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  समझ कर कभी 

Saturday, 28 March 2026

रामचरितमानस के कतिपय रोचक व रहस्य्मय प्रसंग

                                          रामचरितमानस के कतिपय रोचक व रहस्य्मय प्रसंग  


                         प्राक्कथन 

भगवान् राम का चरित्र इतना विशाल , इतना गंभीर आदर्शमय और मर्यादित है कि कोई भी साहित्यकार अपनी पुस्तक में भगवान् राम के विषय में वृहद् जानकारी नहीं दे पाये। इसलिए जिस भक्त ने जिस ग्रन्थ को पढ़ा उसे ही पूर्ण समझ लिया। दक्षिण के कितने ही साहित्यकार हुए जिन्होंने भगवान् राम के विषय में कितना कुछ लिखा है सभी क्षेत्रों में कितने ही साहित्यकार हुए हैं जिनको जो चरित्र मनभाया उसीको अपनी लेखनी का आधार बना लिया। लेकिन इसका अर्थ ये कदापि नहीं कि  भगवान् का चरित्र पूर्ण होगया।भगवान के वृहद् चरित्र के विषय में जिसने भी जो भी कहा है उस पर संदेह करना या प्रश्न चिह्न लगाना मुझे उचित नहीं लगता। भगवान से जुड़े कतिपय कुछ प्रसंगों को मैने चुन कर उन्हें अपनी लेखनी का आधार बनाया है,जो आगे वर्णित हैं -