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Friday 20 April 2018

वक्त की करवट


वक्त की करवट

क्योंकि अब दादी दादी नहीं होतीं,नानी नानी नहीं होतीं
केवल एक वृद्धा,असमर्थ,ज़रूरतमंद,महिला होती है
हाँ घर में  एक महत्वपूर्ण,प्रतिष्ठित स्थान अवश्य है
जो केवल " गिफ्ट एक्सचेंज " के लिए निर्धारित रह गया है

वक्त के अचानक करवट लेने से -
एक बात अच्छी हुई है, इनके पक्ष में कि
कोई अब ये नहीं कह सकता कि
नानी-दादी ने बिगाड़ दिए
क्योंकि नाती-पोते न प्यार करने को मिलते हैं न
गलत बात पर डाँटने को मिलते हैं।
क्योंकि ये सारे काम माता-पिता ही करते हैं
वे ही सारे संबन्धों के पर्याय हैं
संबंधों का बोझ ढोना आसान नहीं
हर सम्बन्ध का अपना महत्व होता है जो अब महत्व विहीन है।
परिणाम प्रत्यक्ष है
संबंधों के प्रति बच्चों की अज्ञानता, कुसंस्कार, उनका मानसिक विकास,
सामाजिक विकास, उनका खालीपन उन्हें कहाँ लेजा रहा है !!
ये है विचारणीय पक्ष ! !
नियंत्रण नियंत्रण नियंत्रण !!
टीवी,मोबाइल,बाहर आना-जाना सब जगह पहरा
अति कठोरता !!इससे उनमें अविश्वास पैदा होरहा है।
ये सब बच्चों को असामान्य,हिंसक बनाने का ही कार्य कर रहे हैं।
चिन्तनीय विषय है !!
कारण कुछ भी माना जा सकता है,जो बहाना मात्र हैं।
चूक बहुत बड़ी होरही है --
पता नहीं किसके भले के लिए ??

                                     ***






Saturday 23 December 2017

ये कैसी रिहाई !!


   ये कैसी रिहाई -------

संघर्ष के बाद महा संघर्ष !!
मस्तिष्क और अधिक अशान्त।
उलझे हुए प्रश्नों का मक्कड़जाल ,ये कैसी रिहाई !
चारों तरफ घूरती आँखें
बिना किसी भी एक उत्तर के
प्र्श्नों की बौछार !नहीं ये रिहाई नहीं
तब जैसा भी था, भोजन था
उसे खाना था खा लिया
कोई जुझारू प्रश्न  नहीं थे,रुच्यानुसार काम करना।
मान-सम्मान-सहानुभूति में निश्छलता,सरलता थी।
लेकिन अब खुद ही आँखें नहीं उठती
क्योंकि अब जो कुछ दिखेगा मिथ्या व व्यंग्यपूर्ण होगा
वेदना,संवेदना रुदन, कहीं सत्याभास नहींहोगा।
नेत्रों के तीर सीधे ह्रदय पर आघात करेंगे
नहीं ये रिहाई  नहीं
कुछ कहने को जिह्वा नहीं तैयार
कुछ सुनने को कर्ण -पटल  नहीं तैयार
अंदर ही अंदर घुटन चुभन अनकहे व्यंग्य बाण
अरे फिर ये कैसी रिहाई।
जो चाहा मिला,पर इस प्राप्ति में भी प्राप्य क्या ??
 वहाँ करने को कुछ था,कहने को कुछ था लेकिन
अब न ----है न ------कुछ है।
असंख्य उलझे हुए सवालों,शंकाओं का घेराव !
कोई सरल राह नहीं,कोई निष्कंटक पथ नहीं
ये किसी रिहाई !पर

सत्य यही है " जो दिखता है वो सदैव सत्य नहीं होता और
                    जो नहीं दिखता वो सदैव असत्य नहीं होता।"
(सामाजिक दर्दनाक दुर्घटना का दुर्दांत परिणाम।)

     फिर भी प्रश्न वहीँ का वहीँ,

ये कैसी रिहाई ,नहीं ये रिहाई हो ही नहीं सकती ???
ये तो  एक तलवार के ऊपर एक और तलवार लटकादी।

                                ******** 







Friday 22 September 2017

प्रेरक सन्देश


प्रेरक सन्देश

कल किसीने ऐसा कुछ कह दिया ,लगा सच ही तो है --

" घर का मुखिया अगर चला जाय तो परिवार में उश्रृंखलता ( उद्दण्डता ) आएगी। जैसे सूर्य की किरणें सारे
विश्व को प्रकाशित करती हैं पर वही रात्रि में न होने पर  विश्व में उद्दण्डता आजाती है।"

        संस्कार अधूरे,शिक्षा अधूरी,मान-सम्मान के भाव बहुत पीछे छूट जाते हैं। यही है कलियुग की पहचान भी।

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" जिस समस्या को आप सुलझा न सकें, उसे उसी वक़्त दफ़ना देना चाहिए। "


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Saturday 9 September 2017

झुर्रियाँ बताती हैं -----


------जीवन अभी बाकी है ----


झुर्रियाँ बताती हैं कि -
बीता हुआ कल अभी ज़िंदा है।
मिचमिचाती आँखों की रौशनी बताती है कि -
पढ़ने-लिखने का जज़्बा वैसा ही है तो वो ज़िंदा हैं
हाथों की कटी-पिटी,बदलती हुई रेखाएँ बताती हैं कि
जीवन अभी बाकी है।
थुल-थुल काया की क्रिया शीलता  बताती है कि-
धड़कनें अभी बाकी हैं।
टाँगों की लड़खड़ाहट बताती है कि
लाठी लेकर चलना अभी बाकी है।
मुँहु से निकलने वाले उलटे-पुल्टे शब्द बताते हैं कि
जीभ में ताकत अभी बाकी है।
कार्य-शैली की गति अब धीमी होगयी है पर
कार्य अभी बाकी हैं।
समयाभाव के कारण लोगों ने आना कम कर दिया है
पर भर-पूर स्वागत होता है तो
मिलने के लिए जाना अभी बाकी है।
हाथ-पैरों के,बढ़कर परेशान करने वाले नाख़ून भी
बताते हैं कि साँसें अभी बाकी हैं तो फिर
निराशा और हताशा क्यों ??
जीओ-जी भरके -----!!!

जय श्री राम !!

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Sunday 3 September 2017

एक हास्य परिकल्पना ---


   एक हास्य परिकल्पना ---

मन तो विचारशील होता है वह सदैव विचारों के ताने-बाने में ही उलझा रहता है। व्याकरण भी
इसी बात की पुष्टि करता है कि दिमाग़ कभी खाली नहीं रहता --इसी विचार शृंखला में दिमाग में
एक विचार कौंधा -दिल के कोने से आवाज़ आयी -

बच्चो,अब मिलेंगे अगले जन्म में
अच्छे बनके
अपने पापा से भी कहना वो भी
को-ओपरेटिव मूड में मिलें
कोई टोका-पीटी नहीं चलेगी
सब अच्छे-अच्छे काम करेंगे
एक दूसरे का सम्मान करेंगे ,प्यार से रहेंगे
कोई छोटा नहीं होगा,कोई बड़ा नहीं होगा। तभी -

एक दूसरे  विचार ने दस्तक दी -
क्यों भई !
ये भी कोई जीना है
न तू-तू न मैं-मैं,   ना , ना ऐसे नहीं बात बनती
इस जन्म में बड़े ने बड़प्पन दिखाया ,
उस जन्म  में मैं दिखाऊँगा।
इस बार मम्मी के आगे बोलने की हिम्मत नहीं हुई
अगले जनम में  बोलेंगे और अपनी मन-मर्जी चलाएँगे।
इस जन्म में हर समय पापा की ही तू ती बोली
उस जन्म में २१वीं सदी के बच्चे बनेंगे
सामने कोई डर-वर नहीं होगा,डट कर सामना करेंगे।

तभी एक विस्फोटक आवाज़ ने पुनः ध्यान भंग किया
ऐसा कुछ नहीं होगा
सभी शान्त होकर अपने मन की बात रखेंगे
एक दूसरे को सुनेंगे और समझेंगे और
कोई बड़े घर की, बड़े बनने की तमन्ना नहीं रखेगा
सब्र से जीएँगे और
एक छोटे से घर में एक दूसरे का चेहरा देखते हुए
रात्रि नमस्कार कर सोएँगे
सुबह प्रणाम करते हुए उठेंगे।
ऐसा होगा हमारा अगला जन्म  !!

                        ********


Monday 21 August 2017

ढूँढती ऑंखें


 ढूँढती आँखें --

कागज़ों पर लिखते-लिखते आँखें खोई- खोई सी
शून्य को ताकती हैं
ढूँढती हैं कहीं कुछ ऐसा दिखाई दे
जिसे वो चाहतीं हैं।
दीवारों की टूटी-फूटी चटकनों में
न जाने कितने चेहरे दिखाई देते हैं
बादलों की टुकड़ियों में
यत्र-तत्र अनेक आकृतियाँ दिखाई देती हैं
ढूँढती रहती हैं,देखती रहती हैं
कहीं कोई पहचाना दिखाई दे
पर ढूँढती हैं किसे,नहीं पता !!
चारों तरफ चेहरे ही चेहरे किन्तु
टिकता कोई नहीं,अदृश्य हो जाते हैं कुछ ही पलों में !
अन्ततः हार कर लौटती हैं वहाँ
जो सदैव पास रहता है
कभी अदृश्य नहीं होता
सदैव मुस्कराता रहता है।
आनन्द आनन्द परमानन्द !!
                     
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उद्धरण


      संकलित

" यदि हर कोई आपसे खुश है, तो निश्चित है,आपने जीवन में बहुत समझौते किये हैं और यदि आप सबसे खुश हैं
   तो निश्चित है,आपने लोगों की बहुत सी ग़लतियों को नज़रअंदाज़ किया है। "    

                                                             *********

कहते हैं बोलने से पहले १०० बार सोचो क्योंकि हर शब्द और वाक्य के अनेक अर्थ हो सकते हैं , जब बोलना हो तो सोचिये कि सुनने वाला क्या वही अर्थ समझेगा जो आप कहना चाहते हैं यदि नहीं तो अपने वाक्य या शब्द के विन्यास को बदल कर सोचिये कि अर्थ आपके अनुसार हो।द्वि अर्थी शब्दों के प्रयोग से बचिए इस प्रकार आप ग़लतफ़हमी का शिकार होने से बच सकते है। 

                                                            ***************

" जब आप अपने मन की बात अपने मन में नहीं रख सकते तो कैसे विश्वास कर सकते हैं कि वो आपके मन की बात को 
अपने मन में रख सकता है।" 


                                                                *****

किसी को उसीकी की भाषा में जबाव देने से पहले सोचो कि " मैं , मैं हूँ।" और वो , वो। आपकी भाषा बदल जाएगी। 

                                                                 *****

जैसे साहित्य समाज का दर्पण है ,वैसे ही आपका " चेहरा आपके विचारों का दर्पण होता है।"  
 


                                                                 *****  


मैं  स्वयं कभी ऊँचे ओहदे पर नहीं देखती पर जो मिलता है उसे सर्वोच्च ओहदे का सम्मान समझती हूँ।