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Sunday, 16 February 2025

idpl से दिल्ली रावानगी

आई डीपी एल से (१९७७) में दिल्ली रवानगी 

१९७३ में विवाहोपरांत मैं वीरभद्र ही आयी थी, कम्पनी में उन दिनों लॉक आउट का खतरा बना रहता था तो कहीं और नौकरी की तलाश करते रहते थे।लगभग तीन वर्ष रहे हम। इस बीच हम एक बेटा और एक बेटी के माता-पिता बन चुके थे।  बेटा लगभग ३ वर्ष का और बेटी २महीने की थी।  तभी एच पी सी दिल्ली से इन्हें नियुक्ति पत्र मिला साक्षात्कार हो चुका था प्रतीक्षा थी कहीं से नियुक्ति पत्र की।वह भी आगया। 

चूँकि इनके माता-पिता दिल्ली में ही थे,इनकी पढ़ाई-लिखाई दिल्ली में ही हुई थी इसलिए इनका मन भी दिल्ली में ही था। उस समय मैं सरकारी स्कूल में अध्यापिका थी किन्तु बेटी को रखने की कोई उचित व्यवस्था नहीं थी। कोई क्रेच नहीं था इसलिए मेरी नौकरी भी नहीं संभव नहीं थी। बहुत सोच विचार के बाद वीरभद्र छोड़ने का निश्चय किया। इनका अपना घर शाहदरा दिल्ली में था। इनकी अपनी माँ पहले ही जब ये चार वर्ष के थे गुजर चुकी थीं। अब तक पिता भी नहीं रहे थे।अब सौतेली माँ के पास रहने के लिए पत्र लिख कर बताया अपने जॉब के बारे में और बताया कि हमें घर में रहना होगा, घर में एक कमरा है पीछे उसमें रह लेंगे पर शाहदरा घर से कोई जबाव नहीं आया इसलिए इन्होंने कम्पनी से त्यागपत्र दे दिया कम्पनी ने भी स्वीकार कर लिया। 

लेकिन जैसे ही स्तीफे की स्वीकृति मिली कि घर से पत्र मिला कि घर में जगह नहीं है कमरे में किरायेदार रहता है यानि अब अपना प्रबंध कहीं और करना है किन्तु कुछ समय तो घर में ही रहना होगा, कुछ सामान भी घर भेजा जा चुका था। वीरभद्र छोड़ कर हम घर पहुँच गए। सब कुछ माँ को बताया। इन्हें ऑफिस भी ज्वाइन करना था। 

इस तरह १८-१९ दिन हम रहे लेकिन माँ का हठ यही था कि अपना इंतजाम करो और एक दिन उन्होंने हमारा सामान भी आँगन में फेंक दिया, बेटे को भी हाथ पकड़ कर बाहर आँगन में बिठा  दिया कि "चल बेटा तू भी चल" अब रहना अधिक मुश्किल होगया। शाम को जब ये  घर आये तब इन्हें ज्ञात हुआ। पर अब क्या करते घर से तो हम चारों बाहर  आगये। यानि घर छोड़ दिया।  लेकिन चलते चलते सोच रहे थे कि जाएँ कहाँ, बोले कुछ दिन तुम माँ के पास चली जाओ लेकिन ये मेरे लिए और मुश्किल लगा। तो बोले अच्छा अभी वीरभद्र ही चलते हैं। क्वॉटर तो ३ महीने हमारे पास ही है चाभी भी हमारे पास है ये विचार कर हम वीरभद्र ही पहुँच गए। 

वहाँ रह कर अपने मित्रों बात चीत की थोड़ी हिम्मत आयी और घर शाहदरा आगये तब तक माँ ने विहार कॉलोनी में किसी के साथ जॉइंट रहने के लिए एक कमरा किराये पर देख रखा था। इसके बाद कुछ ज़रूरी सामान के साथ हम वहीं आगये। दो कमरे थे उसमें एक में मकान मालिक अपने दो बच्चों के साथ रह रहे थे। एक हमें दे दिया था। क्वाटर में एक बाथ रूम,एक टॉयलेट कम्बाइंड था। किचिन उन्हीं के पास थी। 

हमारे कमरे में एक बड़ी अलवारी थी उसमें हमने अपने भगवान् जी को स्थापित किया। बाकी में अपना सामान रखा। पर अभी हमारा सामान जैसे एक बड़ा बॉक्स, एक स्टील एलमिरा, बैड और ड्रेसिंग वॉल मिरर वहीं थे। एक कमरे में लाना मुश्किल लग रहा था, पर माँ ने कहा- अपना सामान यहाँ से ले जाओ नहीं तो किसी को बेच देंगी। सामान की ज़रुरत भी थी इसलिए बहुत कहने पर ये वहाँ से बॉक्स और अलवारी ले आये बाकी वहीं छोड़ दिया। 

इस बॉक्स और अलवारी के आने से बहुत सुविधा होगयी। एक टेबल एच पी सी के ऑक्शन से खरीद कर लाये तो गैस बर्नर रखने का आराम होगया। एक लकड़ी का तख़त था और एक फोल्डिंग बैड खरीद लिया तो फेमिली का काम नियमित रूप से चलने लगा।  इस तरह तरह २ वर्ष हम उसी क्वाटर के एक रूम में रहे। वहीँ बेटे का सरस्वती शिशु मंदिर में एडमीशन के जी में करा दिया। 

दोवर्ष के बाद इनके ऑफिस के एक वर्कर ने कहा कि उसका एक वन रूम सेट साकेत में रेंट के लिए खाली है आप चाहें तो ले सकते हैं। इस तरह हमने वहां शिफ्ट कर लिया था।  4-c साकेत तीन वर्ष हम उसमें रहे वहाँ अच्छा लगा। ३वर्ष वहाँ रहे किन्तु अब उसे भी खाली करना था क्योंकि जिसका मकान था सेवा राम, उसको खुद ही वहाँ  रहना था तो फिर दौड़-भाग हुई और भगवान की असीम कृपा से उसी घर के ठीक सामने वाला क्वाटर ४डी मिल गया यानि कि सामान भी उस घर से केवल खिसका के  ही ले गए कोई परेशानी नहीं हुई किन्तु उसे भी २ वर्ष बाद खाली करना पड़ा क्योंकि उसमें भी मकान मालिक को आना था। 

पर यहाँ एक और भी बड़ा चमत्कार हुआ हम मकान तो देख ही रहे थे,२ मकान हमारी पसंद में थे उनमें से एक मकान का मालिक हमसे एडवांस भी ले गया था। २-१ दिन में शिफ्ट करना था क़ि शाम को वो एडवांस का चैक वापस करने आया और बोला सॉरी मुझे खुद ही अपने किसी अर्जेन्ट काम के लिये घर चाहिए, ये तो ऑफिस में थे मुझे ही बात करनी पड़ी बहस की मैंने लेकिन दिमाग में दूसरा मकान भी था तो बहस छोड़ उसका चैक लिया और उसे विदा कर शीघ्र ही मालवीय नगर वाले मकान पर दोनों बच्चों को  लेकर पहुंची।

 अँधेरा होरहा था, जाकर मकान मालिक से चाभी मांगी वे बोले आपसे कहा था न कि चाभी ये लटक रही है आप जब चाहे ले जाना और मैं चाभी लेकर भगवान् को धन्यवाद देती हुयी बस पकड़ कर घर आगयी। शाम को ऑफिस से जब ये घर आये तो बोले कल सन्डे है शिफ्ट कर लेते हैं मैंने कहा वो तो चैक वापस देगया कह रहा था उसे खुद ही रहना है वो भी हैरान होगये कि अब - -----थोड़ी देर परेशान कर मैं हँसी और सारा मामला बताकर चाभी उन्हें पकडा दी तब चेंज कर चाय-वाय पीकर फ्रेश हुए। इस तरह वहीं साकेत में ८-बी क्वाटर मिला और हम वहाँ शिफ़्ट होगये। ३-४ साल यहाँ भी रहे,तब  बेटा सात वीं में और बेटी उस समय चौथी कक्षा में थी।

  पति हमेशा अपना मकान चाहते थे कोशिश करते रहते थे अपनी सामर्थ्य के अनुकूल मकान मिल जाय। कोशिश ये भी रहती थी कि मुझे भी कहीं जॉब मिलजाय इसलिए अक्सर जहाँ भी वेकेंसी देखते तो मुझसे ऐप्लीकेशन लिखवा कर एप्लाय करवाते रहते थे। तभी एक स्कूल की वेकेंसी जो पोस्ट बॉक्स के नम्बर से निकली थी मैंने एप्लाय किया और कुछ ही दिन में साक्षात्कार के लिए कॉल आगया तब तक मुझे ये नहीं मालूम था कि ये स्कूल इंग्लिश मीडियम है पता लगने पर मैं घबरा गयी, मैंने हिंदी मीडियम से ही पढ़ाई की थी पर कॉल आया था इन्होंने  हिम्मत दी तो चली गयी। 

इंटरव्यू दिया काफी टफ था। बोर्ड में भी काफी लोग थे पर होगया और घर आगये कुछ दिन बाद सैलरी डिस्कस करने के लिए फिर कॉल आया और फिर जाना हुआ।  मेरा नंबर आने पर जब मैं गयी तो मुझसे कहा अभी हम आपको  बारह सौ ही दे पाएँगे। स्कूल नया है सारी  फॉर्मेलिटी पूरी होने पर पूरा स्केल देंगे अगर आप एग्री हों तो ये अपॉइटमेंट लेटर है इस पर सिग्नेचर कीजिये और अमुक तारीख पर नॉएडा स्कूल ब्रांच पर आइये। मैंने कुछ सोचा मेरी पोस्ट हिंदी के लिए थी इंटरव्यू हिंदी इंग्लिश दोनों में ही हुआ था स्पीकिंग इंग्लिश नहीं थी पर थोड़ी बहुत बोलती थी इसलिए मैंने इंग्लिश में ही पूछा "शैल आइ कॉल माय हस्बैंड,ही इज़ वेटिंग आउट साइड " उन्होंने कहा श्योर प्लीज़ कॉल और तब मैने इन्हें बुलाया इनके आने पर सैलरी डिस्कस की बात इन्हें बतायी और इनके एग्री होने के बाद वहीँ सिग्नेचर कर नियुक्ति पत्र लेकर बहुत खुश होकर घर आये। 

और तब आगे का प्लान किया नॉएडा जाना था, बच्चों का स्कूल चैंज करना होगा पर पहले अमुक डेट पर नॉएडा जाना था स्कूल की नयी बिल्डिंग देखनी थी अभी केवल १२ रूम ही थे बच्चों के एडमीशन टैस्ट होने थे इसके लिए २-३ दिन हमें (कुल ९ टीचर्स)को स्कूल आना था, पेपर बनाने थे। इसके बाद बच्चों को बुलाया गया उन्हीं में से एक दिन मैंने अपने बच्चों को भी टेस्ट दिलवाया रिज़ल्ट में पास होने पर बेटे का आठ वीं में और बेटी का पांचवीं में एडमीशन होगया। मई और जून में नेहरू प्लेस से बस से आती रही और नॉएडा में मकान भी देखते रहे और तब पॉवर ऑफ़ एटॉर्नी पर २रूम सेट का एक मकान १९ सेक्टर में हमने खरीद लिया और अब जुलाई से पहले शिफ्टिंग करनी थी। 

उससे पहले एक किराये का मकान भी लिया क्योंकि अपने मकान में कुछ काम कराना था, अब बच्चों को स्कूल जाना था। तब तक हम उस मकान में रहे। दो महीने में हमारा मकान रहने लायक हो गया था। एक दिन उसका शुभारम्भ कराया। पंडित जी आये छोटा सा हवन  पूजा कराई अधिक कुछ नहीं किसी को बुलाया भी नहीं। न तो स्कूल से छुट्टी मिलनी थी और न हमारी इतनी सामर्थ्य थी, लेकिन मुझे याद है अपनी दोनों छोटी बहिनों को शायद रु १५१ /-के मनिआर्डर से भेजे थे और तब हम भगवान् की दया से अपने घर में शिफ्ट होगये। ३० अगस्त को शिफ्ट हुए। बेटे का जन्म दिन था उस दिन।  स्कूल से  टी जी टी ग्रेड का पहला  चेक मिला था बहुत अच्छा लगा था उस दिन।

 लाइफ में कुछ स्थिरता आरही थी कि तभी नॉएडा ऑथर्टी से एक मकान की एक स्कीम निकली जिसमें नॉएडा में ही काम करने वाले ही अप्लाई कर सकते थे। इनका जॉब दिल्ली में था इसलिए मेरे नाम से इन्होंने अप्लाई किया और दो साल में हमें लॉटरी से मकान भी मिल गया जो हमारे इस मकान से बड़ा था। हमारी छोटी सी फैमिली के लिए पर्याप्त था। हम सब बहुत खुश थे बच्चे बहुत खुश थे फिर इसका भी उद्घाटन कराया और सेशन ख़त्म होने पर उस घर से यहाँ शिफ्ट हुए। ये शिफ्टिंग आखिरी और संतोषमय रही। आज हम इसी घर में हैं। दोनोंबच्चों के विवाह होगये, बेटा आर्मी ऑफिसर है उसकी पोस्टिंग होती रहती है बेटी कोलकाता में है दोनों के एक- एक बच्चा है।  वे पढ़ रहे हैं  बेटी ऑन लाइन जॉब कर रही है। 

२०१३ में मेरे पति भगवान् के पास चले गए। तब से  मैं उनके अभाव के साथ कभी यहाँ कभी बच्चों के साथ समय व्यतीत कर रही हूँ। लिखने की मेरी आदत है। सामान्य से टॉपिक पर यदा-कदा कुछ लिखती रहती हूँ इसमें मेरे बेटे ने हैल्प की। मुझे कंप्यूटर पर लिखना सिखाया। मेरे लेखों की पुस्तक भी उसने  पब्लिस करवा दी है। इस तरह लिख कर और बहू बेटे के साथ जीवन यापन कर बहुत आराम से रह रही हूँ। भगवन का आशीर्वाद साथ है बस यही सहारा है। कोशिश करती हूँ, खुद भी खुश रहूँ, बच्चों को भी खुश रखूँ। घुटने की प्रॉब्लम के कारण थोड़ी असहाय सा अनुभव करती हूँ पर ये छोटे से कर्म हैं भगवान के आशीर्वाद से पूरे हो लेंगे। इसी तरह समय पर जीवन की एक दिन इतिश्री भी हो ही लेगी।  

जय श्री राम 

                                     *****

 




 





  




 




 




  



 



                 


   








   

Wednesday, 23 October 2024

जेनेरेशन गेप

 जेनेरेशन गेप 

अरे भई !

ये "जेनेरेशन गेप "इक तरफ़ा कैसे होगया ? 

दो जनों के बीच "गेप"! 

तो एक ही को प्रिवलेज क्यों ? 

क्या ही विचित्र तर्क है; कि :"जमाना बदल गया है समझो, अब ऐसा नहीं होता।'

यही तो कहा जाता है न ! 

अरे भई , किसे समझा रहे हो दूसरे पक्ष के लिए भी जमाना बदला है, उसे भी 'जेनेरशन गेप" का अधिकार मिलना है। 

उसे भी अपनी तरह से जीना है। 

सो भूल जाओ , "जेनेरेशन गेप' का लाभ उठाने की बात !

खुद भी जीओ और दूसरे को भी जीने दो , 

उसकी अपनी तरह। 

धन्यवाद !!


Wednesday, 10 July 2024

 जीवन के कुछ विशेष स्वानुभव 

2024 march  से  2024 मई 

३० मार्च कैलाश हॉस्पिटल एडमिट 

१४ अप्रेल डिस्चार्ज 

पुनः ----

२४ अप्रेल कैलाश हॉस्पिटल एडमिट 

४ मई डिस्चार्ज ( एकमहीने का कालचक्र ) 


      कुछ अभूतपूर्व घटनाएँ जो समय समय पर मेरे जीवन में घटती रही हैं। जिनका भी विवरण मैं करती रही हूँ। इसी से जुड़ी एक और घटना अभी-अभी बहुत ही ज्वलंत रूप में मेरे साथ हुई। ये घटना ३० मार्च २०२४ से शुरू हुई।

     शाम को मैंने खाना खाया उसके कुछ देर बाद ही मेरे पेट में दर्द शुरू हुआ,सोचा गैस का होगा तो अजवाइन,काला नमक गरम पानी के साथ पीया किन्तु कोई आराम नहीं,दर्द बढ़ता ही गया। बहु मेरे पास थी,बेटा अपना काम कर रहा था। मैं नहीं समझ पारही थी कि ये दर्द किस स्तर का है। लिम्का,डाइजीन सब ले लिया कोई आराम नहीं। हालत ऐसी होगयी कि अब उल्टियां भी शुरू होगयीं। शाम ७ बजे से १२.३० बज गए। तब बेटे से कहा बेटा एम्बुलेंस बुलाओ अब मैं हिल भी नहीं सकती। और तत्काल हॉस्पिटल के लिए रवाना होना पड़ा।

     उसके बाद जो मेरे साथ घटित होता रहा, चकित करने वाला था,असामान्य व हैरान करने वाला था उपचार होता रहा ये तो सामान्य जीवन का हिस्सा था। इसके साथ-साथ जो परोक्ष रूप में मेरे साथ होरहा था जिसे केवल मैं ही देख पारही थी,उसीको बताना आवश्यक है। ९९ प्रतिशत लोगों को विश्वास करना मुश्किल होगा, यही कहेंगे वहम है या सपना है। सामान्य जनजीवन के लिए बिलकुल सही है पर बार-बार अपने साथ घटित घटनाओं को सोचती हूँ तो लगता है कुछ तो है जिसे परिवार के लोगों ने स्वयं महसूस किया है। लीमाखोंग की घटना भी कुछ इसी ओर संकेत करती है। 

     पेट के दर्द का कारण डॉक्टर ने बताया,कि आँतों में ब्लॉकेज है ऑपरेशन करना होगा आपकी परमीशन चाहिए,आपस में डिसकस करने के बाद बच्चों ने मुझ से पूछा मैंने कहा प्रॉब्लम है तो करना ही होगा। इस प्रकार ऑपरेशन की प्रक्रिया शुरू हुई मुझे एनेस्थिया दे दिया  गया तब तो मैं बेहोश थी। उस समय जो मैं देख रही थी उसे सपने जैसा कहा जा सकता है। मैं देख रही थी कुछ लोग मुझे बहुत तकलीफ दे रहे हैं बहुत देर तक ऐसा होता रहा मैं लगातार ज़ोर-ज़ोर से चीख़ रही थी। और तब मैं दूर चेयर पर बैठी सब देख भी रही थी। ओप्रेशनकी तकलीफ के कारण मैं फिर चीख पड़ी। तब जाकर वो लोग रुके तब मुझे सुनाई दिया अरे ये तो जाग रही है और मुझे रूम में लाये। यानि तब शायद ओपरेशन पूरा हुआ होगा।

      लेकिन इसके बाद  मैं icu वार्ड में आयी उस वार्ड में पार्टीशन था दूसरे पेशेंट के लिए। मेरे रूम में एक मेरा बेड  था दूसरा मेरे असिस्टेंट  का मेरे बेटे के लिए। यहां से ही मेरी लाइफ का एक नया मोड़ शुरू हुआ। रात को जब मैं सोरही थी अचानक किसी फुसफुसाहट से नींद खुली,देखा तो मेरे पिलो की साइड में सफ़ेद कपड़ों में दो व्यक्ति खड़े कुछ कानाफूंसी कर रहे थे मैंने बेटे को आवाज़ देकर जगाया और कहा बेटा यहाँ दो सिस्टर खड़ी बातें कर मुझे डिस्टर्व कर रही हैं देख कर बेटा बोला ,माँ कोई नहीं हैं बराबर वाले पोरशन से आवाज़ आरही होगी। सुन कर मैं सोगयी किन्तु ये क्रिया नित्य जारी रही।हर रात वही दो व्यक्ति सफेद वस्त्रों में मेरे पिलो की साइड में खड़े होकर फुसफुसाहट करते। नित्य के इसी क्रम में मैंने नोटिस किया कि उनमें से एक व्यक्ति मुझे सफेद चादर उढ़ाता और दूसरा मेरी गर्दन पर हाथ से दबाव डालने की कोशिश करता। तो पहला वाला उसे हटाता और पुनः मुझे ठीक से चादर उढ़ा कर सुरक्षित कर मेरा बचाव करता। एक महीने लगातार ये क्रम चला उसके बाद मैं डिस्चार्ज होकर१४ अप्रेल को घर आगयी। घर आकर मुझे लगा कि अब वो लोग यहां नहीं आएंगे किन्तु नहीं वो यहाँ भी आये और उसी तरह फुसफुसाहट करने लगे लेकिन इस बार आपस में बातें कीं और उनमें से एक चला गया। उसके जाने के बाद पहला वाला मुझसे कुछ इस तरह बोला कि अब आप सुरक्षित हैं आराम कीजिये जब तक समय है। 

     और उसके बाद वो कभी नहीं आया। तब मैने विचार किया,क्या था ये सब ! सोचा शायद देवदूत और यमदूत ही होंगे उनमें से एक मुझे बचा रहा था और दूसरा मुझे लेजाना चाह रहा था। पर देवदूत ने यमदूत को मात दी। पर कब तक के लिए---। नहीं मालूम। 

     इसी बीच एक बात और हुई धर्मराज ने उन दोनों को बुलाया और पूछा - भाई राजेश नाम के व्यक्ति को क्यों नहीं लाये अभी तक ? उन्होंने जबाव दिया- भगवन,आपने राजेश नाम कहा तो हम पुरुषों में ढूँढ रहे थे पर ये महिला है अब------देखते हैं । 

पुनश्च -

एडमिट २४ अप्रैल 

      रात अचानक मुझे वाश रूम जाना था तो बेटे को बुलाया,इतनी कमज़ोरी थी कि मैं स्वयं नहीं जा पारही थी ,बेटे ने जैसे ही आकर मुझे सहारा दिया कि मैं बेहोश होगयी कुछ-कुछ होश था मैं बेटे से कह रही थी मुझे उठाकर वाश रूम में लेजाओ  तब वो लेकर मुझे गया। लेकिन वहां यूरिन के स्थान पर ब्लीडिंग देख कर घबरा गया। और तब फिर एम्बुलेंस को कॉल कर बुलाया और फिर से हॉस्पिटल में एडमिट होना पड़ा। ४मई तक ब्लीडिंग का उपचार हुआ। कारण पता लगाने के लिए कि ब्लीडिंग क्यों हुई,एंडोस्कोपी की गयी। ये बहुत ही पेनफुल थी। कारण तो नहीं पता लगा लेकिन ब्लीडिंग रुक गयी। और फिर तसल्ली होने पर मुझे ४मई को डिस्चार्ज कर दिया और मैं घर आगयी। 

 

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Tuesday, 2 July 2024

मेरे पापा और उनका परिवार

मेरे पापा और उनका परिवार 

   अपने पापा के विषय में अन्यत्र भी प्रासंगिक रूप से थोड़ा बहुत लिख चुकी  हूँ। पर आज मैं कुछ अधिक विशेष जानकारी  देने का प्रयास कर रही हूँ। मेरे दादा धौलपुर निवासी श्री राम नाथ शर्मा रईस के नाम से विख्यात थे। तब राजा-तंत्र था। वे वहां के नर्सिंग भगवान के मंदिर के पुजारी थे। मंदिर में जब भी कोई पारम्परिक उत्सव होता था तो पूरा परिवार राजसी घराने के राजस्थानी लिबास से सुसज्जित होकर उपस्थित होता था। माँ का विवाह बहुत ही शानदार तरीके से हुआ। बारात की चार दिन तक आवभगत की गयी। भर-पूर लेनदेन व शानो सज्जा के साथ सम्बन्ध स्थापित हुआ।

   हमारे पापा सबसे पहली संतान थे , उस से पहले दादाजी तक सब गोद ली हुई संतान थी। बहुत ही लाढ़-प्यार से पापा का लालन-पालन हुआ। उनकी शिक्षा बी ए ,एल एल बी तक हुई। माँ के विवाह के तीन वर्ष बाद मेरा जन्म हुआ था। मेरे बाद मेरी दो बहिनों का जन्म हुआ। तीन लड़कियों के लिए माँ को बहुत सुनना पड़ता।जब माँ पापा से कहतीं तो पापा कहते कोई कुछ भी कहे भी कहे चिंता मत करो, मैं अपनी बेटियों को पढ़ा-लिखा कर योग्य बनाउँगा उसके बाद ही  विवाह करेंगे। इस  तरह सब ठीक ही चल रहा था। 

  पर अचानक पापा को दिमागी रूप से कुछ परेशानी होने लगी। हुआ यूँ कि हमारे पापा अंग्रेज़ मजिस्ट्रेट के अधीन काम करते थे जो उन्हें अपने अनुसार गलत पेपर पर सिग्नेचर करने के लिए बाद्ध्य करता था जो पापा को मंज़ूर नहीं था। और ऐसे  ही विवादों के होते हुए उन्हें एक दिन नौकरी से हटा दिया गया। मैं छोटी थी इसलिए अधिक नहीं जानती पर जो याद है वो ये कि शायद उसके बाद ही अचानक एक दिन पापा घवराये हुए  घर आये और कहने लगे कि दादा पुलिस आरही है और उन्होंने अपनी सारी लॉ की किताबें जलादीं, बस चुप  होगये।घर में सन्नाटा छा गया।  बहुत उपचार कराया लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ। काम पर जाना बंद कर दिया,कभी-कभी अनावश्यक रूप से घर में जो मुझे याद है माँ पर गुस्सा होते,फिर शांत होजाते। बस यहीं से हमारे जीवन की दिशा बदल गयी।

  मुझे अपने पापा के साथ के कुछ मधुर पल भी याद हैं जैसे मुझे शाम को साइकल पे घुमाने लेजाना,शाम को ठंडाई घोटना,कभी भल्ले वाले को बुला लाना घर पर। बुआ को आवाज़ लगाकर बुलाना। पर इस सब के साथ माँ का जीवन अति संघर्षपूर्ण था। तीन लड़कियाँ,पापा का काम छूटना, और सौतेली माँ यानि मेरी दादी का उलाहने देना, आदि से परेशां माँ नानाजी से पत्र द्वारा बतातीं। तो नानाजी को दुखी होकर यह निश्चय लेना पड़ा कि वो माँ सहित हमें अपने पास बुलाएँ, और फिर हमारे भविष्य को सोच कर अपने पास ही बुला लिया। लेकिन हम सबके लिए विशेष रूपसे माँ-पापा के लिए ये निर्णय अधिक परेशानी का था। पापा ने कुछ नहीं कहा वो मिस करते थे। कहते कुछ नहीं कम ही बोलते थे बहुत ही अभावग्रस्त जीवन जीने को विवश हो रहे थे।

  आज हम महसूस कर बहुत दुखी होते हैं। तब तो हम बहुत छोटे थे। इतना ही ज्ञान था कि हमारे पापा की तबियत ठीकनहीं है। यदा-कदा  वो हमारे पास आते थे, तभी की कुछ स्मृतियाँ आज भी तरोताज़ा हैं, जैसे जब वो आते तब चुपचाप आकर छत पर पड़ी कुर्सी पर बैठ  जाते। दौड़ते-भागते जब हम देख लेते तो ख़ुशी से भाग कर माँ आदि सबको बताते, माँ पापा आगये हैं। हम सब उनके काम में लग जाते, उनका बहुत ध्यान रखते। किन्तु ये ख़ुशी अधिक दिन नहीं रहती और वो चले जाते। नानाजी किराये के पैसे दे देते क्योंकि उनके पास पैसे तो होते ही नहीं थे , उन्हीं पैसों में से कुछ पैसे बचा के संभाल के रखते उनसे ही जब मन करता अपने बच्चे परिवार की याद  आती तो फिर हमारे पास,हाथरस आजाते।

  जब आते थे उनका स्वास्थ्य बहुत कमज़ोर होता था। जितने दिन हमारे पास रहते  अच्छी देख-भाल होती तो उनका स्वास्थ्य अच्छा हो जाता था। लेकिन अचानक पता नहीं धौलपुर की हुड़क होती और फिर जाने के लिए  कहने लगते और तब समझाने पर भी नहीं रुकते। नानाजी किराया देते और चले जाते।कुछ दिन वहां रहते किन्तु वहां की मुश्किलों से परेशान होकर पुनः हमारे पास आजाते। लेकिन जब आते थे तो उनकी दशा देख कर बहुत दुःख होता था। टूटा हुआ चश्मा जिसका प्रयोग धागा बाँध कर करते थे। फटे पुराने गंदे कपडे,बढ़ी हुई दाड़ी कि पहचानना मुश्किल होता। नानाजी उसी समय दर्जी बुलाते, कपडे सिलवाते,नाई को बुलाते ,डॉक्टर के पास लेजाकर आँख टेस्ट कराते।चश्मा बनबाते।इस प्रकार पापा की स्थिति ठीक होती।

 पापा की दिनचर्या पूर्णतया नियमित रहती।सुबह चार बजे उठना,टहलने जाना,और वहीँ बगीची पर स्नान करना,ग्यारह साढ़े  ग्यारह बजे तक घर आना,खाना खाना दोपहर में आराम करना और शाम को पुनः घूमने जाना और वहां से नानाजी के ऑफिस  जाना,वहां जाकर ऐल ऐल बी की बुक्स पढ़ना यही उनका क्रम रहता था। कमी थी तो ये कि एक सामान्य व्यक्ति के समान एक नौकरी पैसा जीवन न था। किन्तु स्वाभिमान में कोई कमी न थी, तभी तो अनेकों अभावों के बीच, धौलपुर जाने को तैयार होजाते। 

  जिंदगी के इस पड़ाव पर जब पापा को सोचती हूँ तो मन बहुत व्यथित होता है।  दादी तो मेरी छोटी बहिन को दूध में अफीम भी देने लगी थी जिसका ज्ञान माँ को न था। तब एकदिन पापा की बुआ ने बताया कि  तेरी मौड़ी को वो अफीम दे रही है ताकि वो सोती रहे। इन सब बातों से दुखी हो माँ ने एक बार ये सारी बात हमारे नानाजी से कहीं। परेशां होकर कुछ दिन बाद हमारे नानाजी ने हम सबको अपने पास बुला लिया।लेकिन उसके बाद हम कभी वहां नहीं गए। 

 आज अब मैं सोचती हूँ कि अगर हम आज के समान तब जागरूक होते तो पापा को स्वस्थ कर लेते, हम तो क्या हमारी माँ उस समय बीस-इक्कीस साल की रही होंगी वो भी आज के बच्चों की तरह समझदार तो नहीं थी फिर हम कैसे कुछ ------पर आज मैं इतना तो विश्वासपूर्वक कह सकती हूँ हमारे पापा को भी वो निश्चितरूप से खाने आदि में अफीम देती रही होंगी। जिसके परिणाम स्वरुप पापा शांत व सोचने समझने की शक्ति खो बैठे थे। यहां तक कि  उन्हें पागल जैसे उपेक्षित और अपमानजनक शब्द भी बोले गए। जबकि पागल जैसा सा तो कुछ था ही नहीं। सौतेली माँ यानि हमारी दादी को किसी ने कहा था कि  तुम्हारे एक लड़का होगा वो थे हमारे पापा। इन दादी के छः लड़कियां थीं, अफीम  के ही प्रभाव से हमारे पापा की ऐसी स्थिति हुई होगी। तभी उनके लड़का हुआ। 

 यद्यपि मैं ऐसी दकियानूसी बातों पर विश्वास नहीं करती तथापि जो दिखता है तो सोचने पर विवश हूँ। उनका ये लड़का यानि हमारे चाचा हम चारों बहिन-भाइयों से छोटा है। हमारे आने के बाद हमारे पापा को घर में भी नहीं रहने दिया,मंदिर जिसके दादा स्वयं पुजारी थे वहां रहते थे। हमें नहीं पता वहां उन्होंने कैसे जीवन जीया,नित्यप्रति के कार्य,खाना-नहाना कैसे करते होंगे ! हम सबका ही ये दुर्भाग्य ही था। नानाजी के सहयोग से आज हम सब बहुत ठीक हैं लेकिन पापा का जीवन चलचित्र की भाँति जब सामने घूमता है तो बस कुछ समझ नहीं आता। 

 जब मैं  एम् ए कर स्कूल में पढ़ाने का कार्य कर रही थी तब 1967 में हमें पापा के न रहने का समाचार मिला। वह भी 9 दिन बाद !पापा को केवल प्यार व स्नेह की आवश्यकता थी जो सबको मिलता है। इस तरह माता-पिता, हम बच्चे एक परिवार किन्तु अलग-अलग रह कर जीवन व्यतीत कर रहे थे। हम तो आदरणीय नानाजी के स्नेहिल संरक्षण में थे कि अपने पापा को भी कभी-कभी ही याद करते किन्तु पापा का एकाकी जीवन अति दुर्लभ था। माँ तो अपना दर्द किस से कहतीं,नानी भी नहीं थी,अंदर ही अंदर घुटती रहती थीं। हम चार बहिन-भाई के बीच बड़ी मैं ही हूँ इसलिए मुझे कुछ बातें घर की और पापा के साथ की याद हैं पर बाकी बहिन-भाई को कुछ भी याद नहीं। भाई का तो जन्म भी उस घर में नहीं हुआ था। और अब उसे भी कोविद ने छीन लिया,माँ भी नहीं रहीं।

  हम ही तीनों बहिनें अपना गत-विगत समय को याद कर दुखी होती रहतीं हैं। ये था हमारे "बिलवेड पापा का अनपेक्षित जीवन !!" जिसमें उन्हें उनके  परिवार का भी साथ यदा-कदा ही मिला ।   

                                             **      

                                           





   



Wednesday, 22 November 2023

धन्यवाद प्रभु !!


प्रभु ; आपने तो सब कुछ दिया ,

जीने के समुचित साधन उपलब्ध कराये ,

शान्त्योचित उपकरण भी ! 

फिर भी अशांति !!

प्रभु हर समय यही उलझन ;

ये नहीं,

वो नहीं,

ऐसा क्यों ?

वैसा क्यों ?

उत्तर ----

अरे ! ये कारण तो मैंने नहीं दिए, 

ये तो मन के अंदर से भी नहीं, 

तो क्या बाहर से ?

शायद !

तो इन्हें बाहर करो 

घुसने ही नहीं दो तो 

क्या बचा ?

शांति !!

बस !यही कारण है अशांति का 

बाहर से आने वाली परेशानियों को छोड़ो

शांति का ही वास होने दो !

            ॐ शान्ति शान्ति शान्ति !! 

















 


 

Wednesday, 11 October 2023

गाथा : एक कर्मठ योगी की

 

जन्म तो माता की गोद में ही हुआ ;

चार वर्ष के बाद वह छोड़ गयीं ;

पिता के संरक्षण ने पाला ;

बहुत ही प्यार भरा जीवन !

पिता की सरकारी नौकरी से प्राप्त,पर्याप्त था। 

कि एक अनपेक्षित मोड़ ने -

जीवन की दिशा-दशा ही बदल दी !

छूट गया सब !

पिता का दूसरा विवाह !!

सौतेली माँ का आगमन !

अनचाहे आगमन और उपेक्षित व्यवहार से 

उसका जीवन बिखर गया। 

घर पराया होगया। 

14 वर्ष की आयु में मानसिक आघात था ,

4-5 बार घर छोड़ा,

पहले एक माँ ने छोड़ा 

फिर घर छूटा ,

मिथ्या सम्बधों में भी 3-3 माँओं के आश्रय में 

हायर सेकंडरी तक शिक्षा प्राप्त की,

फिर वे भी छूट गयीं।  

पिता के सहयोग से सरकारी नौकरी भी मिली ,

और अब एक नयी ज़िम्मेदारी !

परिवार ! विवाह हुआ ,

परिवार की ज़िम्मेदारी,और फिर -

केवल ज़िम्मेदारी का अहसास 

मोह रहित जीवन !

कर्म-निर्वाह में रत ,

कहीं भी कोई उपेक्षा ,अवहेलना नहीं,

संतान के अनपेक्षित दुःख !

40 वर्ष का अनवरत कर्तव्य-निर्वाह

किन्तु- 

जब संतान के सुख देखने का समय आया; 

तो सब कुछ बिना देखे ही योगी ने 

इस दुनिया से विदा लेली  !

एक कर्तव्यपरायण कर्म-योगी !

निरंतर कर्तव्य-पथ पर सवार 

अंतहीन दिशा की ओर बढ़ चला ;

दुखों को भी छोड़ा ,

सुखों को भी छोड़ा 

कर्तव्य और अधिकार

सबसे मुँहु मोड़ कर विरक्त-भाव से। 

कोई ग़म नहीं;कोई सुख नहीं;कोई दुःख नहीं। 

और चला गया अपने  मुक्ति-पथ पर !!

      (अनु और श्वेता के पिता )

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मेरी नायिका - मेरी पुत्र-वधु 

कर्तव्य और उत्तरदायित्व,दायित्व,ड्यूटी,मान-सम्मान,अधिकार और स्वाभिमान के बीच झूलती वो वृद्धा !!

आज बच्चे ही उसका जीवन हैं। यानि आज असहाय होने की स्थिति में वे उसकी देख-भाल करते हैं। तो लगता है वो स्वयं उनके लिए बोझ है। स्वाभिमान को चोट तो लगती है,लाचारगी,विवशता जैसी स्थिति होजाती है। जो स्वाभाविक भी है।

घुटने का ऑप्रेशन  

वो नायिका सुबह जल्दी उठती है,अलार्म लगाकर केवल अपने घर में रहने वाली उस वृद्धा को चाय बनाने के लिए। और तब वो वृद्धा महसूस करती है कि केवल उस के ही लिए तो उठी है। फिर ९-१० बजे नाश्ता सर्व करती,मध्याह्न दोपहर भोजन की व्यवस्था सिर्फ उसी के लिए करती,क्योंकि वो स्वयं दोपहर में नहीं खाती । और फिर रात्रि ---

इस सबके इतर वो वृद्धा अपने स्वाभिमान को भूल कर,शांत रहकर निश्चिन्त होकर समय व्यतीत करती। सब कुछ प्राप्य किन्तु उदास,असहाय,पराश्रित !!इस जीवन को कैसे पारिभाषित किया जाय। असहाय विवश होने की पीड़ा तो नहीं भूलती। मानसिक अंतर्द्वंद्व तो बहुत सालता। किंतु दूसरा कोई विकल्प भी  नहीं। उत्तरदायित्व पूरे करना दायित्व निभाना ही तो उस वृद्धा के लिए पर्याप्त नहीं होता। उसका मन भी बहुत कुछ अभाव महसूस करता है । 

 ज़िंदगी के सफर में व्यक्ति औफिस जाता है,ड्यूटी निभाता है,वेतन पाता है बस ! इस बीच और कोई विशेष सम्बन्ध नहीं होता। वही उस वृद्धा को महसूस होने लगा है। इस अपरिहार्य परिस्थिति से मुक्ति कैसे संभव है। प्यार,सम्मान,आदर व समर्पण को स्थान कहाँ है ! बहुत कुछ विचार करते हुए वो वृद्धा शांत और गम्भीर बने रहने का प्रयास करती है। 

पर कभी-कभी इस सबके बीच संतुलन डगमगाता सा प्रतीत होता है। हर पल, हर क्षण  दूभर -------!!


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अप्रेल 2024 

मेरे नी (आँतों)का ऑपरेशन 


पर अभी कुछ और भी बाकी था या अभी है नहीं पता। क्या-क्या इसे अभी और  झेलना बाकी है मेरे लिए,ये तो ईश्वर ही जाने। मेरी इस बीमारी में तो मेरी इस नायिका ने अपनी गहन परीक्षा दी और अविश्वसनीय त्याग तपस्या ने तो उसे बहुत बड़ा कद प्रदान कर दिया। मुझे नहीं पता इसने मेरे लिए क्या-क्या किया,प्रायः मैं  बेहोश ही रही,बाद में इसने और मेरी बेटी और बहिन ने बताया कि किस प्रकार दिन-रात दौड़-भाग कर  मुझे मौत के घर से खींच कर बाहर लेआई। क्या नहीं किया इसने यानि सब बेहोशी की अवस्था में जो करना था सब किया। भगवान की दया इस पर सदैव बनी रहे। 

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