बाल्यकाल
हाँ राजे !
वही शाम ; आज कितनी भिन्न है !
वो शाम जब चिड़िया की तरह फुदकती थी ,
ऊपर नीचे बंदरों के बीच खेलती , उन्हें खों-खों कर चिढ़ाती ,
आज थोड़ी अलग है -
किशोरावस्था
वही शाम ;
नित्य स्कूल जाना,गृह - कार्य करना ,
अँधेरा होने पर ,लाल टैन की रौशनी में पढ़ाई करना ,
घर के काम में सहायता करना -
और लगभग ११ बजे तक अपने हाथ - पैर चमका कर ,
पुनः पढाई का काम पूरा करना -
BA ,MA तक की पढ़ाई पूरी करना ।
और पुनः वही शाम : जीवन का संध्या काल !
गृहस्थ जीवन की शामें ,
गुजारीं पति के साथ !
बच्चों के साथ गुजरा समय ,
अपने कार्यरत जीवन की आपा - धापी,
व्यस्तता अपने चरम पर और
संध्या काल का ढलना -
और वही शामें !
पतिविहीन जीवन की सूनी शामें ,
आती रहीं जाती रहीं।
अपने स्वास्थ्य सम्बधी झटकों से पीड़ित शामें ,
लेकिन ये शामें एक नया रूप लेकर आयीं,
बच्चे का ऑफिस,शाम को आना ,
डिनर करना ,स्टडी रूम में काम करना ,
और फिर वॉक के लिए जाना।
और अब ! प्रौढ़ावस्था !
अपना निजी समय ,
अपना बैड ठीक करना ,
७ . ३० तक बैड पर आराम की मुद्रा में ,
यू -ट्यूब पर कुछ रोचक समाचार ,
एक धारावाहिक देखना :
बच्चों के वॉकिंग से लौटने की प्रतीक्षा ,
९.३०-१०.३० तक निद्रा देवी की गोद में,
और यही नरंतरता का क्रम अनिश्चितकाल तक------!
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