जीवन के कुछ महत्त्वपूर्ण आधार बिंदु
जब मैं कक्षा छह में थी,परिवार का साथ गंगा स्नान के लिए जाना हुआ बचपन में सुना था कि गंगा नहाने से सभी पाप नष्ट होजाते हैं।तभी मैंने सोचा इसका मतलब मेरे अबतक के सभी पाप ख़तम।अब इसी बात का ध्यान रखूँगी कि अब कुछ भी ग़लत न करूँ,और मैंने इस बात का पूरा-पूरा ध्यान भी रखा तथापि मनुष्य गलतियों का पुतला है ,मैंने भी जाने-अनजाने भूल कीं होंगी पर याद नहीं।
स्मरणीय कुछ यादें -
१ -जिन्हें मैंने अपने जीवन का आधार बनाया एक प्रकार से संकल्प ही था। जब मैं ग्यारहवीं में थी तब गर्मी की छुट्टियों में मांमांजी के पास जयपुर जाना हुआ,पूरा संदर्भ प्रसंग मुझे याद नहीं पर एक दिन मांमां जी ने अपने चिर मित्र के बारे में जो कहा सुनकर मैं चकित होगयी,विश्वास ही नहीं हुआ।उन्होंने बताया कि उनके मित्र ने बोला कि 'आज तक मैंने कभी कोई पाप नहीं किया,कभी झूठ नहीं बोला ,किसी का दिल नहीं दुखाया,किसी को कभी कोई कष्ट नहीं दिया।सुन कर मुझे बहुत अच्छा लगा ,आश्चर्य नहीं हुआ,लगा कि ये तो कोई मुश्किल काम नहीं।सीधे-सरल रास्ते पर चलना ही तो है।उसी समय संकल्प किया मैं इसी रास्ते पर चलूँगी।और वैसा प्रयत्न भी किया।अगर कभी मुझे लगा कि अमुक इंसान को मेरे व्यवहार से उसे बुरा लगा होगा तो तुरंत मैंने क्षमा याचना की और तुरंत अपने परेशां मन को शांत और निर्मल बनाया। तब मैंने ये नहीं देखा कि अमुक मुझसे छोटा है या बड़ा। इस संकल्प में भगवान ने सदैव मेरी सहायता की इसके बिना तो मैं ऐसा कभी नहीं कर पाती।
२ -कई बार कुछ घटनाएँ ऐसी हुईं जब मुझे लगा कि मेरी इस ड्यूटी से किसी का कुछ अहित हो सकता है जैसे -
मैं एक अच्छे विद्यालय में कार्य-रत थीअच्छे पद पर थी इसलिए कुछ कार्य अधिक ज़िम्मेदारी के भी करने होते थे, कभी ऐसे समय मुझे अपमानित भी होना पड़ता था। एक बार किसी के अपमानजनक शब्दों ने मुझे अधिक आहत किया तो मुझे अपने सीनियर से शिकायत करनी पड़ी। बात इतनी बढ़ गयी कि प्रबंधक समिति तक पहुँच गयी।मुझे बुलाया गया। विस्तार से सब बात पूछी ,मैंने सब कुछ ईमानदारी से बताया। मुझसे कहा गया कि आप ये सब लिख कर दीजिये। मैं थोड़ा हिचकिचाई ,वे बोले घबराने की कोई बात नहीं,कोई कार्यवाही तो तभी हो पायेगी। मैने बड़े विनम्र स्वर में कहा - कृपया कोई बड़ी कार्यवाही न करें।पर मुझे बुरा लगा,मन को तकलीफ भी हुई इसलिए शिकायत करनी पड़ी।इस पर सर ने कहा -कोई बात नहीं ,आप लिखिए।बहुत ही बेचैन और घबराहट के साथ मैंने सादा पेपर पर अनौपचारिक तरीके से लिख दिया जिसमें स्पष्टतः लिखा कि मैं उनका कुछ अहित नहीं चाहती।लिखकर हस्ताक्षर के साथ वह पेपर मैंने ऑफिस में दे दिया।बाद में मैंने सोचा शायद मुझे इतना आवेश में नहीं आना था क्योंकि परिणाम व्ही हुआ जिसका मुझे अनुमान था। तब से और अधिक शांत और गंभीरता से कार्य करने का संकल्प किया।और पूरा सेवा कार्य काल मैंने बहुत ही सम्मानजनक तरीके से संपन्न किया।आजतक के जीवन काल में मैंने कभी किसी पर क्रोध नहीं किया। इसका मतलब यह भी नहीं कि गुस्सा आया ही नहीं आया लेकिन कभी किसी ने पहचाना नहीं।स्वयं को ऐसा बनाये रखा जैसे कुछ हुआ ही नहीं।
अपना समझ कर कभी किसी से कुछ कहा भी लेकिन जब मुझे लगा उसे वे अपनापन में कही बातें पराए जैसी लगीं तो वह भी कहना बंद कर दिया।और अपनी ही ग़लती समझ वह सब हमेशां के लिए छोड़ दिया।
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समझ कर कभी
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